ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भूमि पर एक साम्रराज्य था मालव गण। मालव गण की राजधानी थी भारत की प्रसिद्ध नगरी उज्जेन । उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था । प्रजावात्सल्या राजा नाबोवाहन की म्रत्यु के पश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने "महाराजाधिराज मालवाधिपति"की उपाधि धारण करके मालव गण को राजतन्त्र में बदल दिया । उस समय भारत में चार शक शासको का राज्य था। शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश हो गया। एकं बार मालव गण की राजधानी में एक जैन साध्वी पधारी।उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण गंधर्व सेन भी उनके दर्शन करने पहुच गया । साध्वी के रूप ने उन्हें कामांध बना दिया। महाराज ने साध्वी का अपहरण कर लिया तथा साध्वी के साथ जबरदस्ती विवाह कर लिया। अपनी बहन साध्वी के अपहरण के बाद उनके भाई जैन मुनि कलिकाचार्य ने राष्ट्र्यद्रोह करके बदले की भावना से शक राजाओं को उज्जैन पर हमला करने के लिए तैयार कर लिया। शक राजाओं ने चारों और से आक्रमण करके उज्जैन नगरी को जीत लिया.शोषद वहाँ का शासक बना दिया गया। गंधर्व सेन साध्वी और अपनी रानी सोम्यादर्शन के साथ विन्धयाचल के वनों में छुप गये.साध्वी सरस्वती ने महारानी सोम्या से बहुत दुलार पाया तथा साध्वी ने भी गंधर्व सेन को अपना पति स्वीकार कर लिया । वनों में निवास करते हुए,सरस्वती ने एक पुत्र को जनम दिया, जिसका नाम भरत हरी रक्खा गया.उसके तीन वर्ष पश्चात महारानी सोम्या ने भी एक पुत्र को जनम दिया.जिसका नाम विक्रम सेन रक्खा गया। विंध्याचल के वनों में निवास करते हुए एक दिन गंधर्व सेन आखेट को गये,जहाँ वे एक सिंह का शिकार हो गये। वहीं साध्वी सरस्वती भी अपने भाई जैन मुनि कलिकाचार्य के राष्ट्र द्रोह से छुब्द थी।महाराज की म्रत्यु के पशचात उनहोने भी अपने पुत्र भ्रत्हरी को महारानी को सोंपकर अन्न का त्याग कर दिया।और अपने प्राण त्याग दिए। उसके पश्चात महारानी सोम्या दोनों पुत्रों को लेकर कृषण भगवान् की नगरी चली गई,तथा वहाँ पर आज्ञातवास काटने लगी। दोनों राजकुमारों में भ्रताहरी चिंतन शील बालकथा,तथा विक्रम में एक असाधारण योद्धा के सभी गुन विद्यमान थे। अब समय धीरे धीरे समय अपनी कालपरिक्र्मा पर तेजी से आगे बढने लगा। दोनों राजकुमारों को पता चल चुका था की शको ने उनके पिता को हराकर उज्जैन पर अधिकार कर लिया था,तथा शक दशको से भारतीय जनता पर अत्याचार कर रहे है।विक्रम जब युवा हुआ तब वह एक सुगतित शरीर का स्वामी व एक महान योद्धा बन चुका था। धनुषबाण, खडग, असी,त्रिसूल,व परशु आदि में उसका कोई सानी नही था.अपनी नेत्रत्व्य करने की छमता के कारन उसने एक सैन्य दल भी गठित कर लिया था। अब समय आ गया था ,की भारतवर्ष को शकों से छुटकारा दिलाया जाय।वीर विक्रम सेन ने अपने मित्रो को संदेश भेजकर बुला लिया.सभाओं व मंत्रणा के दौर शुरू हो गए। निर्णय लिया गया की ,सर्वप्रथम उज्जैन में जमे शक राज शोशाद व उसके भतीजे खारोस को युद्ध में पराजित करना होगा।परन्तु एक अड़चन थीकि, उज्जैन पर आक्रमण के समय सौराष्ट्र का शकराज भुमक व तक्षिला का शकराज कुशुलुक शोशाद की साहयता के लिए आयेंगे। विक्रम ने कहा की, शक राजाओं के पास विशाल सेनाये है,संग्राम भयंकर होगा,तो उसके मित्रो ने उसे आश्वासन दियाकी, जब तक आप उज्जैन नगरी को नही जीत लेंगे ,तब तक सौराष्ट्र व तक्षिला की सेनाओं को हम आप के पास फटकने भी न देंगे। विक्रम सेन के इन मित्रों में सौवीर गन राज्य का युवराज प्रधुम्न, कुनिंद गन राज्य का युवराज भद्रबाहु,अमर्गुप्त आदि प्रमुख थे। अब सर्वप्रथम सेना की संख्या को बढ़ाना व उसको सुद्रढ़ करना था। सेना की संख्या बढ़ाने के लिए गावं गावं के शिव मंदिरों में भैरव भक्त के नाम से गावों के युवकों को भरती किया जाने लगा। सभी युवकों को त्रिशूल प्रदान किए गए। युवकों को पास के वनों में शास्त्राभ्यास कराया जाने लगा.इस कार्य में वनीय छेत्र बहुत साहयता कर रहा था। इतना बड़ा कार्य होने के बाद भी शकों को कानोकान भनक भी नही लगी. कुछ ही समय में भैरव सैनिकों की संख्या लगभग ५० सहस्त्र हो गई.भारत वर्ष के वर्तमान की हलचल देखकर भारत का भविष्य अपने सुनहरे वर्तमान की कल्पना करने लगा। लगभग दो वर्ष भाग दौर में बीत गए.इसी बीच विक्रम को एक नया सहयोगी मिल गया अपिलक। अपिलक आन्ध्र के महाराजा शिवमुख का अनुज था। अपिलक को भैरव सेना का सेनापति बना दिया गया। धन की व्यवस्था का भार अमर्गुप्त को सोपा गया। अब जहाँ भारत का भविष्य एक चक्रवाती सम्राट के स्वागत के लिए आतुर था,वहीं चारो शक राजा भारतीय जनता का शोषण कर रहे थे और विलासी जीवन में लिप्त थे। इशा की प्रथम शताब्दी में महाकुम्भ के अवसर पर सभी भैरव सेनिको को साधू-संतो के वेश में उज्जैन के सैकडो गावों के मंदिरों में ठहरा दिया गया .प्रय्तेक गाँव का आर मन्दिर मनो शिव के टांडाव् के लिए भूमि तैयार कर रहा था। महाकुम्भ का स्नान समाप्त होते ही सैनिको ने अपना अभियान शुरू कर दिया। भैरव सेना ने उज्जैन व विदिशा को घेर लिया gayaa . भीषण संग्राम हुआ। विदेशी शकों को बुरी तरह काट डाला गया। उज्जैन का शासक शोषद भाग खड़ा हुआ.तथा मथुरा के शासक का पुत्र खारोश विदिशा के युद्ध में मारा गया। इस समाचार को सुनते ही सौराष्ट्र व मथुरा के शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया। अब विक्रम के मित्रों की बारी थी, उन्होंने सौराष्ट्र के शासक भुमक को भैरव सेना के साथ राह में ही घेर लिया,तथा उसको बुरी तरह पराजित किया, तथा अपने मित्र को दिया वचन पूरा किया। मथुरा के शक राजा राज्बुल से विक्रम स्वम टकरा गया और उसे बंदी बना लिया। आंध्र महाराज सत्कारणी के अनुज अपिलक के नेत्र्तव्य में पुरे मध्य भारत में भैरव सेना ने अपने तांडव से शक सेनाओं को समाप्त कर दिया। विक्रम सेन ने अपने भ्राता भरथरी को उज्जैन का शासक नियुक्त कराया। तीनो शक राजाओं के पराजित होने के बाद ताछ्शिला के शक रजा कुशुलुक ने भी विक्रम से संधि कर ली। मथुरा के शासक की महारानी ने विक्रम की माता सौम्या से मिलकर छमा मांगी तथा अपनी पुत्री हंसा के लिए विक्रम का हाथ मांगा । महारानी सौम्या ने उस बंधन को तुंरत स्वीकार कर लिया। विक्रम के भ्राता भरथरी का मन शासन से अधिक ध्यान व योग में लगता था इसलिए उन्होंने राजपाट त्याग कर सन्यास ले लिया। उज्जैन नगरी के राजकुमार ने पुन: वर्षों पश्चात गणतंत्र की स्थापना की व्यवस्था की परन्तु मित्रों व जनता के आग्रह पर विक्रम सेन को महाराजाधिराज विक्र्माद्वित्य के नाम से सिंहासन पर आसीत् होना पडा। लाखों की संख्या में शकों का याघ्होपवीत हुआ। शक हिंदू संस्कृति में ऐसे समां गए जैसे एक नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है। विदेशी शकों के aakramano से भारत मुक्त हुआ तथा हिंदू संस्क्रती का प्रसार समस्त विश्व में हुआ। इसी शक विजय के उपरांत इशा से ५७ वर्ष पूर्व महाराजा विक्रमाद्व्टी के राज्याभिषेक पर विक्रमी संवत की स्थापना हुई। आगे आने वाले कई चक्रवाती सम्राटों ने इन्ही सम्राट विक्रमादित्य के नाम की उपाधि धारण की.
International Dev Sewa Samiti ( अन्तरराष्ट्रिय देव सेवा समिति ) देव समुदाय पुर्बी मधेश तराई नेपाल के बिषिस्ट एतिहासिक संस्कृतिक पहिचान भेल एक जाति अछ .| International Dev Sewa Samiti ( अन्तरराष्ट्रिय देव सेवा समिति ) देव समुदाय पुर्बी मधेश तराई नेपाल के बिषिस्ट एतिहासिक संस्कृतिक पहिचान भेल एक जाति अछ .| समस्त देव, चौधरी & पौदार स्वजाति लोक्नीसब से बिनम्र अन्नुरोध अछ | हमर अहाके जातीय अस्तितव के सबाल अछ .हम अहाके एक जुट होइके परत |
Monday, April 14, 2014
नौ रत्न और उज्जैन में विक्रमादित्य का दरबार..
भारतीय परंपरा के अनुसार धनवंतरी, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट (या (बेतालभट्ट), वररुचि, और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे. कहते हैं कि राजा के पास "नवरत्न" कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे.
कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे. वरामिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी.वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे. माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना "नीति -प्रदीप" (Niti-pradīpa सचमुच "आचरण का दीया") का श्रेय दिया है.
विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि
धन्वन्तरिः क्षपणको मरसिंह शंकू वेताळभट्ट घट कर्पर कालिदासाः। ख्यातो वराह मिहिरो नृपते स्सभायां रत्नानि वै वररुचि र्नव विक्रमस्य।।
विक्रम और शनि.
शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है. कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था. अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी. ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की. समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है. लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था. इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं. विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था. जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधिक हो गए. उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे. जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है. विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे. विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि "जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा" और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं.
एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है. घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं - जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था. इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है. विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे. विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया. विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया. दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया. विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे. जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया. उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा. विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं. चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे. ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा.
किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए. जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी. जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई. लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है, और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया. बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा. भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया. वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी. धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी. उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया. वह सो गई. जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है. जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं. उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है.
विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया. राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए. जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया. उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं. वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं. उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं. वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं. वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं.
एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है. वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं. इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं - नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा. वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है. राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है. वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं. उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है. अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं. वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था. शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं. विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें. वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे. शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे. राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं. उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं. वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है. विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं.
विक्रमादित्य की पौराणिक कथा ||
अनुश्रुत विक्रमादित्य, संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं, दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है. उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है, जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हों, हालांकि उनके इर्द-गिर्द कहानियों का पूरा चक्र फला-फूला है. संस्कृत की सर्वाधिक लोकप्रिय दो कथा-श्रृंखलाएं हैं वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी ("पिशाच की 25 कहानियां") और सिंहासन-द्वात्रिंशिका ("सिंहासन की 32 कहानियां" जो सिहांसन बत्तीसी के नाम से भी विख्यात हैं). इन दोनों के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं.
पिशाच (बेताल) की कहानियों में बेताल, पच्चीस कहानियां सुनाता है, जिसमें राजा बेताल को बंदी बनाना चाहता है, और वह राजा को उलझन पैदा करने वाली कहानियां सुनाता है और उनका अंत राजा के समक्ष एक प्रश्न रखते हुए करता है. वस्तुतः पहले एक साधु, राजा से विनती करते हैं कि वे बेताल से बिना कोई शब्द बोले उसे उनके पास ले आएं, नहीं तो बेताल उड़ कर वापस अपनी जगह चला जाएगा. राजा केवल उस स्थिति में ही चुप रह सकते थे, जब वे उत्तर न जानते हों, अन्यथा राजा का सिर फट जाता. दुर्भाग्यवश, राजा को पता चलता है कि वे उसके सारे सवालों का जवाब जानते हैं; इसीलिए विक्रमादित्य को उलझन में डालने वाले अंतिम सवाल तक, बेताल को पकड़ने और फिर उसके छूट जाने का सिलसिला चौबीस बार चलता है. इन कहानियों का एक रूपांतरण कथा-सरित्सागर में देखा जा सकता है.
सिंहासन के क़िस्से, विक्रमादित्य के उस सिंहासन से जुड़े हुए हैं जो खो गया था, और कई सदियों बाद धार के परमार राजा भोज द्वारा बरामद किया गया था. स्वयं राजा भोज भी काफ़ी प्रसिद्ध थे और कहानियों की यह श्रृंखला उनके सिंहासन पर बैठने के प्रयासों के बारे में है. इस सिंहासन में 32 पुतलियां लगी हुई थीं, जो बोल सकती थीं, और राजा को चुनौती देती हैं कि राजा केवल उस स्थिति में ही सिंहासन पर बैठ सकते हैं, यदि वे उनके द्वारा सुनाई जाने वाली कहानी में विक्रमादित्य की तरह उदार हैं. इससे विक्रमादित्य की 32 कोशिशें (और 32 कहानियां) सामने आती हैं और हर बार भोज अपनी हीनता स्वीकार करते हैं. अंत में पुतलियां उनकी विनम्रता से प्रसन्न होकर उन्हें सिंहासन पर बैठने देती हैं.
विक्रमादित्य संस्कृत
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- गुप्त राजा के लिए, चंद्रगुप्त II विक्रमादित्य देखें
विक्रमादित्य संस्कृत: विक्रमादित्य (ई.पू.102 से 15 ईस्वी तक) उज्जैन, भारत के अनुश्रुत राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे. "विक्रमादित्य" की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें उल्लेखनीय हैं गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे). राजा विक्रमादित्य नाम, विक्रमvikrama यानी "शौर्य" और आदित्य[[|Āditya]] , यानी अदिति के पुत्र के अर्थ सहित संस्कृत का तत्पुरुष है. अदिति अथवा आदित्या के सबसे प्रसिद्ध पुत्रों में से एक हैं देवता सूर्य, अतः विक्रमादित्य का अर्थ है सूर्य, यानी "सूर्य के बराबर वीरता (वाला)". उन्हें विक्रम या विक्रमार्क भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है).
विक्रमादित्य ईसा पूर्व पहली सदी के हैं. कथा सरित्सागर के अनुसार वे उज्जैन परमार वंश के राजा महेंद्रादित्य के पुत्र थे. हालांकि इसका उल्लेख लगभग 12 शताब्दियों के बाद किया गया था. इसके अलावा, अन्य स्रोतों के अनुसार विक्रमादित्य को दिल्ली के तुअर राजवंश का पूर्वज माना जाता है.[1][2][3][4][5]
हिन्दू शिशुओं में विक्रम नामकरण के बढ़ते प्रचलन का श्रेय आंशिक रूप से विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के बारे में लोकप्रिय लोक कथाओं की दो श्रृंखलाओं को दिया जा सकता है.
- गुप्त राजा के लिए, चंद्रगुप्त II विक्रमादित्य देखें
नव वर्षक आ जुड-शितल सिरुवा पर्ब के हार्दिक मंगलमय शुभकामना ।
मेरे प्रिय समस्त देव, चौधरी, पौदार स्वजाति & मित्रगन आप सभी माहनुभाओ का आभिवादन नव वर्ष संवत २०७१ की हार्दिक बधाई नव वर्ष २०७१ क हार्दिक शुभकामना ।
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सम्पूर्ण मधेश प्रेमी,मधेशी जनता ,स्वजाति,मित्र-गण, भाई, बहन, दोस्त, मधेश के हमारे भाई बहन आ मधेश के अन्य हमारे अत्मजन एबम बिसिस्ट महानुभाब लोग्नी आप सभी को जुड-शितल सिरुवा पर्ब हार्दिक मङ्गलमय शुभकामना जुड-शितल सिरुवा पर्ब के नव उमंगमे नव तरंगमे, अहाँक हृदय नव उत्सवसँ भरए, मनमे शान्ति, सफलता जिवनमे, नव स्वप्नसँ नयन सदति भरल रह………।
जुड-शितल सिरुवा पर्ब के हार्दिक मंगलमय शुभकामना ।नया साल २०७१, जुडशीतल पर्व का हार्दिक मंगलमय शुभकामना सुख, सु-स्वास्थ्य, दिर्घायु, तथा तथा उत्तरोत्तर प्रगतिक कामना हैं... !!!!! जो यू और अपने सपनों को हर तक सफलता मिलती है सूरज के लिए सच हो जाता है बढ़ती...===
मधेश के सम्पूर्ण मधेशी जनता, ,स्वजाति,मित्र-गण, भाई, बहन, दोस्त, सभी को जुडशीतल सिरुवा पर्व के हार्दिक मंगलमय शुभकामना सुख, सु-स्वास्थ्य, दिर्घायु, तथा तथा उत्तरोत्तर प्रगतिक कामना हैं... !!!!! जो यू और अपने सपनों को हर तक सफलता मिलती है सूरज के लिए सच हो जाता है बढ़ती...जुड-शितल सिरुवा पर्ब के बरसए हर्ष नितसुख शान्तिक ई नदी बहाबए ।करए मनोरथ पूरा सभकेरजन–जनमे प्रित स्नेह जगाबए ।
।मधेश तराई क्षेत्रक महत्व पूर्ण पर्ब मधेशी वर्ग के जुड-शितल सिरुवा पर्ब के राष्ट्रिय पर्ब के रुपमे अधिराज्य भर बैशाख २ गते के दिन बिदा कायम करु. और मधेश तराई के समस्त मधेशी आ नेपाली वर्ग के जुड-शितल सिरुवा पर्ब के रास्ट्रिय मधेशी बिदा कायम करु और जुड-शितल सिरुवा पर्ब मे मधेशी बिदा कायम करु…जय मधेश जय "नव संवत् मुझे नव संचार भरे जग की नौसेना चांदनी; नव आशा के कलश सजाकर , मंगलमय करे संसार" आप सभी माहनुभाओ का आभिवादन नव वर्ष संवत २०७१ की हार्दिक बधाई नयाँ बर्ष २०७१ जुड शितल सिरुवा पर्ब के हार्दिक मंगलमय शुभकामना। बिक्रम्संबत के सुरवात राजा बिक्रम दितय के सम्यसे होते आरहा है। जुड-शितल त्योहार मिथिला ( हिन्दु ) का नया साल है जो कि १ वैशाख पर पड़ता है निशान. मिथिला क्षेत्र में भी भारत, वे अभी भी बिक्रम सम्बत कैलेंडर का पालन करने के लिए इस नए साल का जश्न मनाने. इस त्योहार के दौरान मैथिलि लोग जानकारीपूर्ण कार्यक्रमों के विभिन्न प्रकारों का आयोजन.करते है।
नव संवत् मुझे नव संचार भरे जग की नौसेना चांदनी; नव आशा के कलश सजाकर , मंगलमय करे संसार" आप सभी माहनुभाओ का आभिवादन नव वर्ष संवत २०७१ की हार्दिक बधाई नयाँ बर्ष २०७१ जुड शितल सिरुवा पर्ब के हार्दिक मंगलमय शुभकामना। बिक्रम्संबत के सुरवात राजा बिक्रम दितय के सम्यसे होते आरहा है। जुड-शितल त्योहार मिथिला ( हिन्दु ) का नया साल है जो कि १ वैशाख पर पड़ता है निशान. मिथिला क्षेत्र में भी भारत, वे अभी भी बिक्रम सम्बत कैलेंडर का पालन करने के लिए इस नए साल का जश्न मनाने. इस त्योहार के दौरान मैथिलि लोग जानकारीपूर्ण कार्यक्रमों के विभिन्न प्रकारों का आयोजन.करते है।
शब्द जुडशितल दो शब्दों से ली गई है: जो 'जमात' आशीर्वाद और इसका मतलब है 'शितल ' ठंडा मतलब है. मिथिला क्षेत्र बैशाख २ गते के महीने के बाद भीषण गर्मी का सामना इसलिए, इस त्योहार के लिए एक शांत वातावरण लाने के लिए मनाया जाता है. यह त्यौहार भी त्योहार सफाई और स्पष्टता के रूप में माना जाता है. लोगों के लिए अनिवार्य इस त्योहार के दौरान स्तु खाने के लिए है. इसी तरह, बडी झोड़ी और चिरैटो अन्य इस त्योहार में महत्वपूर्ण खाद्य वस्तुओं रहे हैं. हमारे वर्तमान संदर्भ में, हमारी संस्कृति और प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण के पहलू पर, इस त्योहार महत्वपूर्ण माना जा सकता है.
नव बर्षमे बरसए हर्ष नित सुख शान्तिक ई नदी बहाबए । करए मनोरथ पूरा सभकेर जन–जनमे प्रित स्नेह जगाबए ।।
जुडशीतलक शीतलता सहेजिकऽ हमरासभक पहिचान नष्ट करबाक लेल अपने डारिपर उगल किछु बाँझीसभक अमरलत्तीपनकेँ लतियबैत अपन हरियरी कायम राखि सकी, इएह अछि नव वर्ष २०७१ क हार्दिक मङ्गलमय शुभकामना
नव वर्षक नव भोरमे, नव उमंगमे नव तरंगमे, अहाँक हृदय नव उत्सवसँ भरए, मनमे शान्ति, सफलता जिवनमे, नव स्वप्नसँ नयन सदति भरल रह………। नव वर्षक हार्दिक मंगलमय शुभकामना ।===
नव वर्ष २०७१ क हार्दिक शुभकामना ।
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स्वजाति के सभी सदस्यों के लिए प्रकृति के कोने जो हमें बताता है सम्थिंग से खुश नया साल, बधाई. २०७१ १ बैशाख पर अपनी गतिविधियों से पर्यावरण बारिश हो रही, इसके रेक्नेउ हवाओं मयाँथिंग नष्ट कर. नष्ट के लिए गड़गड़ाहट का प्रतीक है. इसलिए है कि हम बहुत ध्यान से हमारे राष्ट्र के लिए जाना है, क्योंकि इस साल हमें दिखाने के लिए सुनहरा वर्ष है होना चाहिए कि उच्चतम लेने सगरमाथा एवं गौतम बुद्ध .....................
" नव संवत्सर अर्थात नव वर्ष का अभिनन्दन !"
"क्रोध्ब्दे निखिला लोकाः क्रोध लोभ परायणाः|
इतिदोषेण सततं मध्य सस्यार्घ वृष्टयः||
आर्यावर्त की संस्कृति एवं संस्कार के अनुयायी ,समस्त मित्रवर ,नूतन संवत्सर ,[नववर्ष] के आगमन पर हम अभिनन्दन करते हैं , साथ ही -उन्नति ,प्रसन्नता की कामना भी ! राम - राम,नमस्कार , ||
आंग्लभाषा [अंग्रेजी ] -का साल तो प्रारंभ हो चूका है ,सभी जानते हैं किन्तु हम अपनी ही संस्कृति से अनभिग्य होते जा रहे हैं | चैत्र मास की प्रतिपदा से नवसंवत्सर का प्रारंभ होता है -अंग्रेजी का -2014 और संस्कृत का संवत्सर -२०७१ है |
अस्तु -इस संवत्सर का रजा चन्द्र एवं मंत्री गुरु हैं जो मित्रता के प्रतीक हैं ,जब आपस में प्रेम होता है तो प्रसन्नता भी आती है |
[१]-संवत्सर का नाम -क्रोधी है -तो ये बात भी पक्की है की सभी क्रोधी स्वाभाव के सालभर रहेंगें ,और क्रोध का कारण लोभ होता है -हो सके तो हमलोग लोभ कम करेंगें तो क्रोध स्वतः ही समाप्त या कम हो जायेगा -जिससे हमारा विकास होगा ||
[२]-अन्न की स्थिति -टिड्डी ,कीटदोष,विषाक्त वायुमंडल -के कारण -अन्न ,खनिज पदार्थ कम उत्पन्न होंगें -क्योंकि इसके कारण भी हमहीं हैं -तो हो सके तो प्रकति के साथ चलें ||
[३]-वर्षा -जल के विना सब कुछ अधुरा रहेगा -परन्तु -वरुण देवता की यत्र -तत्र मामूली कृपा बनी रहेगी -अतः जल का भी सम्मान करें ||
[४]-वस्तु-हमारी आवश्यकताएं इतनी बढ़ गयीं हैं कि पूर्ति ही नहीं हो पातीं हैं -"अन्नात भवति पर्जन्नाया " जब अन्न कम होंगें [वस्तुएं कम होंगीं तो मंहगाई भी बधेंगीं ||
"देव युवा एकता" जिन्दाबाद। देव युवा सब एक जुट होऊ।
Wednesday, July 31, 2013
Morning Murli Om Shanti Bap Dada Madhuban View 31-07-2013@@ MURLI IN ENGLISH
卐!! ॐ नमः शिवाय!!卐!! !!卐!! शिव है धर्म का मूल सत्यम, शिवम और सुंदरम | शुभ प्रभात मित्रजनो...... जो व्यक्ति दुःख और सुख में हमारे साथ रहे वही हमारा वास्तविक हितैषी है... आपका दिवस मंगलमय हो.|ओम शान्ति |ओम शान्ति | ओम शान्ति | ओम शान्ति | ओम शान्ति | परमात्मा शिव. |.. ॐ नम शिवाय....ॐ नमः शिवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ नमः शिवाय....ॐ नम शिवाय...!
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31 July 2013 Murli
View 31-07-2013@@ MURLI IN ENGLISH
Question: What are the main signs of wise children?
Answer: Wise children constantly play with knowledge. They are always intoxicated in Godly intoxication. All the knowledge of the world cycle is in their intellects. They have the intoxication: Our Baba has come from the supreme abode for us and we resided with Him in the supreme abode. Our Baba is the Ocean of Knowledge and we have become master oceans of knowledge. He has come to give us the inheritance of liberation and liberation-in-life.
Song: Who has come to the door of my heart?
Essence for dharna:
1. Surrender everything with your intellect and live as a trustee. Perform every task with great caution according to shrimat.
2. Remember Baba and the inheritance and experience limitless happiness. While in remembrance of Baba, experience Godly intoxication. Become a true lover.
Blessing: May you be a carefree emperor who considers the self to be an instrument and performs every action with the awareness: “The One who is inspiring everyone is getting it done through me”.
“The One who makes everyone move is making me move, the One who is inspiring everyone is getting it done through me” Be an instrument with this awareness as you continue to perform actions and you will remain a carefree emperor. When you have the awareness that you are doing something, you cannot then remain a carefree emperor. However, the awareness that you have been made an instrument by the Father gives you the experience of a carefree and worry-free life. Then, there is no worry of what is going to happen tomorrow. Such a soul has the faith that whatever is happening is good and that whatever is going to happen will be even better because the One who is inspiring everyone is the best of all.
Slogan: Give everyone the experience of happiness and comfort through your vibrations of peace and happiness and only then will you be called a true server.
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31 July 2013 Murli
View 31-07-2013@@ MURLI IN ENGLISH
Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban
English Murli
Essence: Sweet children, you have come to this spiritual university to change from buddhus (foolish ones) to wise. Wise means pure. You are now studying this study to become pure.Question: What are the main signs of wise children?
Answer: Wise children constantly play with knowledge. They are always intoxicated in Godly intoxication. All the knowledge of the world cycle is in their intellects. They have the intoxication: Our Baba has come from the supreme abode for us and we resided with Him in the supreme abode. Our Baba is the Ocean of Knowledge and we have become master oceans of knowledge. He has come to give us the inheritance of liberation and liberation-in-life.
Song: Who has come to the door of my heart?
Essence for dharna:
1. Surrender everything with your intellect and live as a trustee. Perform every task with great caution according to shrimat.
2. Remember Baba and the inheritance and experience limitless happiness. While in remembrance of Baba, experience Godly intoxication. Become a true lover.
Blessing: May you be a carefree emperor who considers the self to be an instrument and performs every action with the awareness: “The One who is inspiring everyone is getting it done through me”.
“The One who makes everyone move is making me move, the One who is inspiring everyone is getting it done through me” Be an instrument with this awareness as you continue to perform actions and you will remain a carefree emperor. When you have the awareness that you are doing something, you cannot then remain a carefree emperor. However, the awareness that you have been made an instrument by the Father gives you the experience of a carefree and worry-free life. Then, there is no worry of what is going to happen tomorrow. Such a soul has the faith that whatever is happening is good and that whatever is going to happen will be even better because the One who is inspiring everyone is the best of all.
Slogan: Give everyone the experience of happiness and comfort through your vibrations of peace and happiness and only then will you be called a true server.
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