Tuesday, May 13, 2014

आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी कर्ने पर शुभकामनाये । आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी कर्ने के पर्ती हार्दिक सम्मान किया जता है ।



आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी कर्ने पर शुभकामनाये
आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी कर्ने  के पर्ती हार्दिक सम्मान किया जता है

मेरे प्रिय समस्त देव स्वजाती लोग्नी , देव, चौधरी, पौदार स्वजाति & सम्पूर्ण मित्रगन से बिनम्र अन्नुरोध है ।
समस्त देव स्वजाति को जानकारी या सूचित किया जाता है। हमारे स्वजाति के अनदर  बिना दहेज शादी आदर्श शादी बिबाह   कि सुरवात होगई है।



     समस्त देव स्वजाति के लिए एक खुशी कि खबर है। हमारे देव स्वजाति मे बिना दहेज लिए शादी कि सुरवात होगई है। हाल मे हि एक आदर्श बिबाह  बिना दहेज शादी बिबाह सम्पन हुवा है। २०७१-बैशाख-२५ ( 2014-May-08 ) के दिन धुम धाम से बिना दहेज के आदर्श बिबाह  बिना दहेज शादी सम्पन हुवा है। मधेश के जिल्ला सप्तरी ग्राम बिषहरिया -०४ के रहने बाले श्री रामलगन चौधरी जी के कनिस्ट सुपुत्र श्री भाष्कर चौधरी जी के बिना दहेज लिए आदर्श बिबाह  शादी २०७१-बैशाख-२५ ( 2014-May-08 ) के दिन मधेश के जिल्ला सप्तरी ग्राम कंचनपुर हाल बिराटनगर के रहने बाले श्री लाल देव जी के कनिस्ट सुपुत्री सुश्री चन्द्रिका देव जी के संग आदर्श बिबाह  १ भी पैसा दहेज न लेके ये शादी सम्पन हुवा है। ईस नई बिबाहित जोडी बैबाहिक दापंत्य जीवन सुखमय रहे आदर्श शादी कर्ने बालो भाष्कर चौधरी जी के पिता जी ने जो स्वजाति मे बिना दहेज के आदर्श शादी आपने लड़को के किए है ये निश्चित रुप से देव स्वजाति मे एक मिशाल कायम करेगा और हमारे देव स्वजाति मे बिना दहेज आदर्श शादी कि सुरवात होगई है। श्री भाष्कर चौधरीसुश्री चन्द्रिका देव जी के माता-पिता श्री रामलगन चौधरी जी आ श्री लाल देव जी ने २०७१-बैशाख-२५ ( 2014-May-08 )  के दिन  बिना दहेज के आदर्श शादी अपने पुत्र पुत्री के किए है। आप दोनो ने जो इस तरह से आदर्श शादी अपने पुत्र पुत्री के किए है। हमारी अंतर्राष्ट्रीय  देव सेवा समिति ( International Dev Sewa Samiti ) तरफ से आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी कर्ने पर शुभकामनाये आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी कर्ने  के पर्ती हार्दिक सम्मान किया जता है।


                       






             श्री भाष्कर चौधरी और सुश्री चन्द्रिका देव जी आप  दोनोको हमारी अंतर्राष्ट्रीय  देव सेवा समिति ( International Dev Sewa Samiti ) तरफ से शादी की ढेरों शुभकामनाएं और हार्दिक बधाई, आने वाला प्रत्येक नया दिन, आपके जीवन में अनेकानेक सफलताएँ एवं अपार खुशियाँ लेकर आए !! इस अवसर पर ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह, वैभव, ऐश्वर्य, उन्नति, प्रगति, आदर्श, स्वास्थ्य, प्रसिद्धि और समृद्धि के साथ आजीवन आपको जीवन पथ पर गतिमान रखे !!! जीवन हर पल जीने, उत्साह उमंग के साथ उसे अनुभव करने का नाम है ! हर दिन का शुभारम्भ उत्साह के साथ ऐसे हो जैसे नया जन्म हो,दिन भर हर क्षण योगी की तरह जियो, जरा भी नकारात्मकता को प्रविष्ट मत होने दो ! सकारात्मक, सकारात्मक मात्र सकारात्मक ! यही तुम्हारा चिन्तन हो ! यह चिन्तन यदि दापंत्य जीवन के शुभारम्भ से ही अपनाने का संकल्प ले लो, तो तुम्हें सफलताओं के शीर्ष तक पहुँचने में ज्यादा विलम्ब न होगा !! ईश्वर करे आप में आनंद और उल्लास जगे.आपके सुखद व उज्जवल भविष्य की मंगलकामना ईश्वर से और हमारे । कुल देवता  माँ बागेश्वरी और माँ काली से करते हैं."हर दिन नया जन्म समझें, उसका सदुपयोग करें" सदैव आपका दापंत्य जीवन सुखमय रहे. परमपिता आपको रोग दोष मुक्त जीवन प्रदान कर दिर्घायु बनाये, कुल देवता  माँ बागेश्वरी और माँ  काली की सेवा और रक्षा हेतु आपको और अधिक साहस,सामर्थ, इच्छाशक्ति प्रदान करें, आप प्रगति पथ पर निरंतर उन्नति प्राप्त करें, आपकी यश कीर्ति इस संसार के समस्त कोनों में सूर्य के प्रकाश की तरह ऊर्जा और चन्द्रमा के प्रकाश की भांति शीतलता प्रदान करें, दुःख, शोक, भय आपको छूकर भी ना निकले.उस सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर कुल देवता  माँ बागेश्वरी और माँ  काली से यह प्रार्थना है कि आज की हर प्रार्थना को जो मैंने लिए   अंतर्राष्ट्रीय  देव सेवा समिति ( International Dev Sewa Samiti ) आप सब समस्त देव स्वजाति  के लिए की है,वो पूर्ण हो
ईस आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी  के  लिए   अंतर्राष्ट्रीय  देव सेवा समिति ( International Dev Sewa Samiti ) परिवार तरफ आप सब को स्वागत करते हुवे हार्दिक सम्मान कर्ता है।  आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी कर्ने पर शुभकामनाये। आदर्श बिबाह (बिना दहेज लिए) शादी कर्ने  के पर्ती हार्दिक सम्मान किया जता है



अंतर्राष्ट्रीय  देव सेवा समिति
International Dev Sewa Samiti

Friday, April 18, 2014

धाकड क्षत्रिय देश

धाकड पुराण के अनुसार धाकड़ क्षत्रिय समूह का उद्भव महाभारत काल में हुआ। धाकड क्षत्रिय समूह लगभग बारहवीं शताब्दी के बाद एक जाति के रूप में परिणित हुआ। धाकड ऐतिहासिक क्षत्रिय वंशजों में से बने हुयेएक समूह का नाम है, जिसका मूल पेशा कृषि है। कालान्तर में यह जाति रूप में परिवर्तित हो गया। बहुत समय पहले की धाकड क्षत्रियों के विषय में यह कहावत सुनी जाती है- धाकड लाकड सायर सा, नर बारे नल वंश अर्थात् नर बर के राजा नल के वंशज धाकड सायर की लकडी के समान मजबूत थे। धाकड क्षत्रियों के विषय में एक अंग्रेज सेना नायक जेम्स मेड्रिड ने कहा था कि -धाकड क्षत्री अफगानी घोड ों की तरह मजबूत, कुशल तथा चतुर लडाकू हैं। आजकल धाकड शब्द का प्रयोग तेजतर्रार, वीरता और मजबूती का भाव प्रकट करने के लिए किया जाता है। जिससे जाहिर होता है कि किसी समय में धाकड क्षत्रियों का वैभव ऊॅचा रहा है। कुछ धाकड क्षत्रिय वंशज पृथ्वीराज तृतीय की राजसभा में धवल, सामन्त रहे थे जिनकी वीरता एवं वैभव का अनुभव पृथ्वीराजरासो ग्रन्थ की इस पंक्ति के द्वारा होता है- धब्बरे धाबर धक्करेै रण बंकरै। धाकड क्षत्रिय देश में नागर, मालव, किराड तीन उपसमूहों के रूप में प्रायः राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में पाये जाते हैं। धाकड श्री धरणीधर भगवान (बलदाऊ) जिन्हैं हलधर कहा जाता है, को अपना ईष्टदेव मानते हैं। श्री धरणीधर भगवान का नागर चाल क्षेत्र के मांडकला गांव में तथा जिला झालावाड के सुगर गांव में भव्य मन्दिर है। ऐतिहासिक वर्णनों एवं प्रमाणों के अनुसार बारहवीं शताब्दी से पूर्व सभी क्षत्रिय वंश शाखाओं के वंशजों को क्षत्रिय शब्द का ही प्रयोग होता था। लगभग बारहवीं-तेरहवीं शताबदी से राजवंशी क्षत्रियों को राजपूत तथा कृषिकर्मी क्षत्रियों को धाकड़ कहा जाने लगा। अतः धाकड सभी क्षत्रिय वंश शाखाओं में से बने हुए एक समूह का नाम है, जिनका मूल पेशा कृषि था। देशभर में धाकड जाति के लोग अधिकतर कृषि प्रधान ही मिलते हैं। पहले किसी की नौकरी करना धाकड जाति में घृणास्पद माना जाता था।उतम खेती , मध्यम व्यापार, कनिष्ठ चाकरी के कथनानुसार अब भी धाकड जाति में कर्मठ किसान पाये जाते हैं। वर्तमान में धाकड क्षत्रिय तीन उपसमूहों में विभकत हैं- नागर, मालव और किराड। इन उपसमूहों में परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध एवं रोटी बेटी व्यवहार होता है। धाकड जाति में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं है। धाकड जाति प्रायः राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में पाई जाती है

धाकड़ उत्पत्ति एवं उपसमूह:-
धाकड पुराण एवं पुस्तक वस्त्रभूषण के अनुसार महाभारत काल में योगिराज श्रीकृष्ण जो मुकट व वंशीधर रहे थे दाउबलराम जो हलधारण करने के कारण हलधर कहलाये ने पुरूषार्थी कृषकों को संगठित किया और कृषि कार्य को करते हुए क्षात्रधर्म का पालन करने के लिऐ प्रेरित किया, वे क्षत्री हीधाकड क्षत्रिय कहलाये। बलदाउजी को धरणीधर भी कहते हैं यह शेषनाग अवतार थे। उपरोक्त की पुनरावृति वि० सं.११४० में अजमेर के राजा बीसल देव के समय में हुई । जो कृषक क्षत्रीयत्व को भूलकर के कृषि कार्य में लगे हुए थे, साथ ही युद्ध में क्षत्रीयों के वीरगति को प्राप्त हो जाने से संखया कम हो रही थी। उस समय बीसल देव को उसके सहयोगी मालवा नरेश उदयादित्य परमार ने एक युक्ति बतलाई। तद्नुसार उन्होनें उन कृषकों को जो मूलतः क्षत्रीय ही थे, संगठित किया और उनके वह स्वयं ही अधिनायक बने। उस समूह का नाम उन्होंने धरा को खड करने वाला अर्थात् भूमि को जोतने वाला धरखड क्षत्रीय रखा। जो कालान्तर में परिवर्तित होकर धाकड कहलाया।

नागर चाल जागा की पोथी के अनुसार चौहानों की २४ शाखाओं में से एक शाखा दाईमा चौहान से राजा धरणीधर हुऐ, उन्होंने शस्त्र छोडकर (राजकार्य छोडकर )कृषि कार्य प्रारम्भ किया। श्री धरणीधर से ही धाकड नामकरण हुआ। राजा धरणीधर के चार पुत्र थे-' (१)शारपाल (२) वीरपाल (३) विशुपाल (४)वावनिया। जिनके उतरोतर वंश से चार शाखायें हुई :- १. शारपाल-सोलिया मेवाडा धाकड २. वीरपाल- नागर धाकड ३. विशुपाल-मालव धाकड ४. वावनिया-पुरवीया धाकड (किराड) कृषि व्यवसाय को अपनाकर वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर बस गये। स्थान (क्षेत्र) विशेष के आधार पर भी नामकरण पर प्रभाव पड़ा जैसे-नागर चाल बूंदी की सीमा व नागौर परगने में जाकर बसे वे नागर, मालवा में बसे वे मालव एवं पूर्वउतराचल में जाकर बसे वे किराड कहलाये।


लटूर जागा, कैथून जिला कोटा के अनुसार राजा बीसलदेव जी ने गढ अजमेर में राज किया। दिल्ली में राज किया । बीसलदेवजी के तपोधन पुत्र हुआ। तपोधन के धरणीधर पुत्र हुआ। धरणीधर के अजमल जी पुत्र हुआ। अजमलजी की धर्मपत्नी पूरणमलजी की कान कंवरबाई की पढीपात की पुत्री। जिनका पुत्र-नागराज जी, कानाजी, माधौजी, नेनगजी हूवा। दूजी धर्मपत्नी कीवसी की केसरबाई पोखरणा ब्राह्मण की। बेटा-धारू जी हुवा। १- नागराज जी- अन्तरवेद की धरती, नागर चाल में बंटया जिससे नागर धाकड हुए। १४० गोत्र। २- कानाजी- पूरब की धरती में बंटया जिससे किराड धाकड हुए। किराड गोत्र ३६० ३- माधोजी-डीडवाना की धरती में बंटया जिससे मेसरी (महेद्गवरी)धाकड हुऐ। गोत्र १४४ ४- नेनगजी-मालवा देश में बंटया,जिससे नथफोडा धाकड हुऐ। गोत्र १४२ ५- धारूजी -मालवा देश में बंटया, जिससे जनेउ कतरा माली (मालव)धाकड हुए। गोत्र१०९ उक्तांकित जागा लेखों के अनुसार धाकड जाति चौहान बंशी होनी चाहिए, जबकि धाकड जाति में सभी क्षत्रिय वश पाये जाते है। जागाओं की लिखने की लिपि एक अलग ही प्रकार की होती है जिसे मैं अपने शब्दों में अद्गुाद्ध लेखन लिपि ही कहूंगा। इन जागाओं के लेखों में कही की ईट कही का रोडा, भानवती ने कुनवा जोडा वाली कहावत चरितार्थ होती हैं। जिसके कारण इनके लेख ऐतिहासिक तथ्यों से पूर्णतया मेल नहीं खाते हैं। अन्ततः उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि धाकड जाति क्षत्रीय वर्ण की है। धाकड कृषि कर्मी क्षत्रीयों के एक समूह का नाम है, जिसमें सभी क्षत्रीय वंश पाये जाते हैं। धाकड समूह का उदभव महाभारत काल में हुआ वि०सं० ११४० में अजमेर के राजा बीसलदेव धाकड (धरखड)समूह के अधिनायक बने। कालान्तर में यह समूह धाकड जाति के रूप में परिणित हो गया। अजमेर के राजा वीसलदेव के समय में भंयकर युद्धाग्नि या अकाल से पीडित होने के कारण अथवा यह कहिए किसी भी कारणवश धाकड क्षत्रिय अजमेर छोड़कर यत्र-तत्र बस गये। पृथक-पृथक क्षेत्रों या स्थानों पर बसने के कारण क्षेत्रों या स्थानों के नाम पर ही पृथक-पृथक उपसमूहों का नामकरण हुआ ।

मालवा जागाओं की पोथी के अनुसार
अजमेर के राजा वीसलदेव चौहान थे। उनके समय में ब्राह्मणों का बड़ा बर्चस्व था, वह राजा से रूष्ट थे। उन्होंने कर एवं लगान देना बन्द कर दिया। तब बीसलदेव ने ब्राह्मणों को वश में करने के लिए मंत्री की सलाह से एक यज्ञ का आयोजन किया यज्ञ में नो लाख छत्तीस हजार ब्राह्मणों को ब्रह्मभोज का आयोजन था। भोजन में मास मिलाया गया जिससे कि उनका ब्रह्मत्व नष्ट हो जावे। जब ब्राह्मणो को भोजनपरोस दिया गया तब भोजन करते समय आकाशवाणी द्वारा उनको मालूम हुआ कि भोजन में मास मिला हुआ है, ब्राह्मण उठ खडे हुऐ और क्रोधित होकर श्राप देने लगे कि-हे राजा तेरा राज्य नष्ट हो जायेगा। श्राप देकर प्द्गचाताप करने लगे, कुछ ब्राह्मणों ने आत्महत्या भी कर ली शेष सब मिलकर धरणीधर ऋषि के पास विचार विमर्श करने पहुंचे। सारा वृतान्त ऋषि को सुनाया। ऋषि ने कहा कि तुम धर्म से विचलित हुऐ हो, तुम्हारा ब्रह्मत्व नष्ट हो चुका है। अतः अब तुम सब मिलकर एक साथ रहो तुमने धोखे से अभक्ष का भक्षण किया हैं। जिसके कारण आज से तुम्हारी जाति धाकड कहलायेगी। उस समय ब्राह्मणो ने अजमेर छोडने की प्रतिज्ञा की तथा स्वेच्छा से कृषि कार्य को अपना लिया। उपरोक्त लेखन से ऐसा प्रतीत होता है कि राजा बीसलदेव द्वारा किये गये यज्ञ आयोजन में सम्मलित होने वाले ब्राह्मण निराक्षत्री रह गये। जिन्होंने स्वेच्छा से कृषि कार्य को अपनाकर क्षात्रधर्म का पालन करनेलगें तथा अजमेर राज्य छोड कर यत्र तत्र बस गये।

किराड़:-
जोधपुर राज्य के परगने मालानी में बाडमेर से १० मील उतरपद्गिचम में प्राचीनऐतिहासिक नगर किराडू, किरारकोट या किरारकूट (किराडू) कहा जाने वाला ध्वंशावद्गोष के रूप में स्थित है। यहॉ परमार शासकों के मन्दिरों के खंडहर हैं। मूलनगर वीरान हो चुका है। किराडू परमारवंशी क्षत्रीयों की राजधानी रही थी। किराडू का संस्थापक एवं प्रथम शासक तथा किराडू का परमार वंश का प्रथम ऐतिहासिक पुरूष सिन्धुराज वि०.सं०९५६ से ९८१ तक रहा। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार ९वीं सदी से लेकर १३ वीं सदी तक किराडू पर परमार,सोलंकी वंशी क्षत्रीयों का शासन रहा । यवन आक्रमण काल में यवनों का भारत में मुखयतः समृद्वि गूजर और मालवा प्रदेश की ओर जाने का मार्ग किराडू होकर ही था। अतः सबसे पहले यवनों का सामना किरार कोट (किराडू)को ही करना पडता था। अतः (कि=करना, रार=लडाई कोट =किला)इस नगर का किरार कोट या किरार कूट नाम पडने का यही कारण है। किरार कोट या किरार कूट का रूपान्तर शब्द किरारू या किराडू कहलाया। किरारू का अर्थ है (कि=करना, रारू =लडाकू)अर्थात लडाई करने वाले। राजस्थानी भाषा में  का उच्चारण  किया जाता है। जिसके कारण किरारू शब्द को किराडू कहा जाता हैं

मालव:-
मालव नाम की एक प्राचीन जाति थी। मालव जाति के लोगों ने आकर (पूर्वी मालवा), अवन्ति (पद्गिचमी मालवा),उज्जैन तथा उसके आस-पास के भागों पर अपना अधिकार जमाया तो उन्होंने अपना अधीन किये हुए इलाकों का सामूहिक नाम मालवा प्रदेश रखा। प्रतापगढ, कोटा, झालावाड तथा कुछ हिस्सा टोंक का मालवा प्रदेश के अर्न्तगत ही था। मलवा पर परमार वंशी क्षत्रियों का भी राज्य रहा। वि.सं. १०२८ से १०५४ तक के समय में मालवा का परमार वंशी राजा मुंज रहा। उसके दरबार के पंडित हलायुद्ध ने -- पिंगल सूत्र विधि में मुंज को ब्रह्म क्षत्र कुल का कहा है। ब्रह्मक्षत्र शब्द का अर्थ है, जिसमें ब्रह्मत्व एवं क्षत्रत्व दोनों का गुण विद्यमान हों या जिनके पूर्वज ब्राह्मण से क्षत्रिय हो गये हों। अतः राजा मुंज के समय तक परमार वंद्गिायों को ब्रह्मक्षत्र कहा गया। प्रसिद्ध इतिहासकार डा. दशरथ शर्मा ने बिजौलिया लेख के आधार पर चौहानों को ब्राह्मणों की सन्तान बतलाया है। कर्नल टांड ने चौहानों को विदेशी माना है। प्रतिहार वंशी क्षत्रियों को जब बौद्ध धम्र से वापस वैदिक धर्म में दीक्षित कर (अग्नि साक्षी संस्कार कर ) लिया गया तो उनके मूल पुरूष को यज्ञप्रतिहार कहा गया। इसकी एक शाखा मालवा में जाकर रही थी। पृथ्वीराज राशो में परमार, चौहान, सौलंकी, प्रतिहार (परिहार )वंशों को अग्निवंशी लिखा है। अग्निवंश का तात्पर्य है कि इनके मूल पुरूष क्षत्रिय नहीं थे, जिससे उनको अग्नि साक्षी का संस्कार कर क्षत्रियों में मिला लिया । मालव धाकड अग्निवंद् गाी क्षत्रिय है। अजमेर के राजा वीसलदेव ने ब्राह्मणों को वश में करने के लिये एक यज्ञ किया था। उस यज्ञ में सम्मिलित होने वाले ब्राह्मणों (ब्रह्मक्षत्रों) को धोखे से भोजन में मांस खिला दिया गया। जिससे उनका ब्रह्मत्व नष्ट हो गया उनका ब्रह्मत्व नष्ट हो गया उनका ब्रह्मत्व नष्ट हो जाने पर जो अजमेर को छोडकर मालवा प्रदेश में आकर बस गये और कृषि कार्य करने लगे या यवनों के आक्रमण के कारण जो कृषि कर्मी क्षत्रीय मालवा में आकर बस गये तथा जो आरम्भ से ही मालवा प्रदेश के रहने वाले थे, कृषक क्षत्रीय मालवधाकड कहलाये। मुखयतः मालव धाकडों में अग्निवंशी क्षत्रिय हैं। इतिहासकारों ने परमार (ब्रह्ममक्षत्र)चौहान,सोलंकी प्रतिहार क्षत्रीय वंशोें को अग्निवंश में माना है मालव धाकडों को मेवाडा एवं सोलिया भी कहा जाता है। यह फर्क क्षेत्रीयतानुसार प्रतीत होता है।

नागर:-
अजमेर के राजा बीसलदेव के शासन काल में उत्तर पद्गिचम की तरफ खैबर के दर्रे से मुसलमानों के लगातार आक्रमण के कारण साथ ही भीषण अकाल पड़ने के कारण उसके राज्य में अव्यवस्था उत्पन्न हो गई। किसान तबाह हो गये, खेती बाडी नष्ट हो गयी, जनजीवन त्रस्त हो गया। फलस्वरूप वहां से अधिकाशं कृषक क्षत्रिय (धरखड-धाकड)पलायन कर सुविधानुसार बस गये। जो नागर चाल (उण्यिारा बूंदीकी सीमा ) और नागौर परगने में जाकर बसे थे, मूलतः नागर धाकड कहलाये। वर्तमान में जयपुर, अलवर, भरतपुर, करौली, आगरा, मथुरा जिलों में भी नागर धाकड रहते हैं

गुप्त राजवंश

गुप्त राजवंश या गुप्त वंश प्राचीन भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था। इसे भारत का एक स्वर्ण युग माना जाता है।
मौर्य वंश के पतन के बाद दीर्घकाल तक भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं रही। कुषाण एवं सातवाहनों ने राजनीतिक एकता लाने का प्रयास किया। मौर्योत्तर काल के उपरान्त तीसरी शताब्दी इ. में तीन राजवंशो का उदय हुआ जिसमें मध्य भारत में नाग शक्‍ति, दक्षिण में बाकाटक तथा पूर्वी में गुप्त वंश प्रमुख हैं। मौर्य वंश के पतन के पश्चात नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनस्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को है।
गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का प्रारम्भिक राज्य आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार में था।

अनुक्रम

  

Thursday, April 17, 2014

चन्द्र गुप्त मौर्य एक महान वैश्य-CHANDRAGUPTA MOURYA A GREAT VAISHYA

चन्द्र गुप्त मौर्य एक महान वैश्य-CHANDRAGUPTA MOURYA A GREAT VAISHYA



सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य एक वैश्य जाति माहुरी से सम्बन्ध रखता था। गुजरात का





राज्यपाल पुष्पगुप्त जो की उसका बहनोई था वह भी एक वैश्य था। गुप्त या

गुप्ता उपनाम केवल वैश्य ही प्रयोग करते थे , ओर करते हैं । चन्द्रगुप्त ने बाद

में जैन धर्म अपना लिया था, जैन पूरी तरह से एक वैश्य जाती हैं. १००% जैन वैश्य हैं।

माहुरी जाति अपने आप को चन्द्रगुप्त का वंशज मानती हैं। जो की बिहार के गया

जिले में निवास करती हैं। मौर्य उपनाम चन्द्रगुप्त को चाणक्य ने दिया था।





क्योंकि चन्द्रगुप्त कि माँ का नाम मुरा था। मुरा से ही मौर्य बना। चन्द्रगुप्त की पत्नी

एक वैश्य नगर सेठ की पुत्री थी। चन्द्रगुप्त की कुलदेवी माता लक्ष्मी थी।

जो की वैश्य समुदाय की कुल देवी मानी जाती हैं। चन्द्रगुप्त के समय में जो विदेशी

इतिहासकार भारत में आयें उन्होंने भी चन्द्रगुप्त को वैश्य ही बताया था।

इतिहास में उसका कही भी क्षत्रिय होने का प्रमाण नहीं मिलता हैं। नाही शुद्र होने का,

क्योंकि एक ब्रहामण चाणक्य कभी भी एक शुद्र को शिक्षा नहीं दे सकते थे।




राजा को हमेशा क्षत्रिय माना गया हैं, वैश्य समुदाय की अधिकतर जातियों की उत्पत्ति



क्षत्रियो से ही हुईं हैं। जो की एक इतिहास हैं। भारत मैं हर जाति व समुदाय का

शासन रहा हैं। आधुनिक इतिहासकारों को कोई भी राजा व सम्राट, वैश्य व शुद्र होना

हज़म नहीं होता हैं। चन्द्रगुप्त के पोते सम्राट अशोक की पत्नी भी एक वैश्य पुत्री थी।

ज़ाहिर हैं रिश्ते नाते आदमी अपने वर्ण या जातिं में ही करते रहे हैं। ये प्रमाण

सिद्ध करते हैं। कि चन्द्रगुप्त मौर्या और सम्राट अशोक वैश्य ही थे।

Tuesday, April 15, 2014

सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य - HEMU VIKRAMADITYA

सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य या केवल हेमू (१५०१-१५५६) एक हिन्दू राजा था, जिसने मध्यकाल में १६वीं शताब्दी में भारत पर राज किया था। यह भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण समय रहा जब मुगल एवं अफगान वंश, दोनों ही दिल्ली में राज्य के लिये तत्पर थे। कई इतिहसकारों ने हेमू को 'भारत का नैपोलियन' कहा है |

      
16वीं शताब्दी में एक नाम हेमू का आता है। महाराज हेमचन्द्र विक्रमादित्य वह विद्युत की भांति चमके और देदीप्यमान हुए। हेमू दोसर वैश्य  भार्गव वंश के गोलिश गोत्र में उत्पन्न राय जयपाल के पौत्र और पूरनमाल के पुत्र थे। हेमू का एक दूसरा नाम हेमू बनिया बक्कल भी था.  हेमू 16वीं शताब्दी का सबसे अधिक विलक्षण सेनानायक था । राजा विक्रमाजीत हेमू जन्म से मेवात स्थित रिवाड़ी के हिंदू थे जो अपने वैयक्तिक गुणों तथा कार्यकुशलता के कारण यह सूर सम्राट् आदिलशाह के दरबार का प्रधान मंत्री बन गया थे। यह राज्य कार्यो का संचालन बड़े योग्यता पूर्वक करते थे। आदिलशाह स्वयं अयोग्य थे और अपने कार्यों का भार वह हेमू पर डाले रहते थे।
जिस समय हुमायूँ की मृत्यु हुई उस समय आदिलशाह मिर्जापुर के पास चुनार में रह रहे थे। हुमायूँ की मृत्यु का समाचार सुनकर हेमू अपने स्वामी की ओर से युद्ध करने के लिए दिल्ली की ओर चल पड़े। वह ग्वालियर होते हुए आगे बढे और उसने आगरा तथा दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया। तरदीबेग खाँ दिल्ली की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया था। हेमू ने बेग को हरा दिया और वह दिल्ली छोड़कर भाग गया।
इस विजय से हेमू के पास काफी धन, लगभग 1500 हाथी तथा एक विशाल सेना एकत्र हो गई थी। उन्होंने अफगान सेना की कुछ टुकड़ियों को प्रचुर धन देकर अपनी ओर कर लिया। तत्पश्चात्‌ उन्होंने प्राचीन काल के अनेक प्रसिद्ध हिंदू राजाओं की उपाधि धारण की और अपने को 'राजा विक्रमादित्य' अथवा विक्रमाजीत कहने लगे। इसके बाद वह अकबर तथा बैरम खाँ से लड़ने के लिए पानीपत के ऐतिहासिक युद्धक्षेत्र में जा डटे। 5 नवंबर, 1556 को युद्ध प्रारंभ हुआ। इतिहास में यह युद्ध पानीपत के दूसरे युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। हेमू की सेना संख्या में अधिक थी तथा उसका तोपखाना भी अच्छा था किंतु एक तीर सम्राट हेमचन्द्र की आँख को छेदता हुआ सिर तक चला गया। हेमचन्द्र ने हिम्मत न हारते हुए तीर को बाहर निकाला परन्तु इस प्रयास में पूरी की पूरी आँख तीर के साथ बाहर आ गई। आपने अपने रूमाल को आँख पर लगाकर कुछ देर लड़ाई का संचालन किया, परन्तु शीघ्र ही बेहोश होकर अपने ``हवाई´´ नामक हाथी के हौदे में गिर पड़े।
शहर के कतोपुर स्थित साधारण परिवार से निकलकर अंतिम हिंदू सम्राट होने का गौरव प्राप्त करने वाले राजा हेमचंद विक्रमादित्य 7 अक्टूबर 1556 को मुगलों को हराकर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए थे।
आपका महावत आपको युद्ध के मैदान से बाहर निकाल रहा था कि मुगल सेनापति अली कुली खान ``हवाई´´ हाथी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा और बेहोश हेमू को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गया। इस प्रकार दुर्भाग्यवश सम्राट हेमचन्द्र एक जीता हुआ युद्ध हार गये और भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र दोसर वैश्य  (भार्गव) वंश का शासन 29 दिन के बाद समाप्त हो गया।
बैराम खाँ के लिए यह घटना एकदम अप्रत्याशित थी। बैराम खाँ ने अकबर से प्रार्थना की कि हेमू का वध करके वह `गाज़ी´ की पदवी का हक़दार बने। आनन-फानन में अचेत हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया। जिससे हेमू के समर्थकों की हिम्मत या भविष्य के विद्रोह की संभावना को पूरी तरह कुचल दिया जाय।
दिल्ली पर अधिकार हो जाने के बाद बैराम खाँ ने हेमू के सभी वंशधरों का क़त्लेआम करने का निश्चय किया। हेमू के समर्थक अफ़ग़ान अमीर और सामन्त या तो मारे गए या फिर दूर-दराज़ के ठिकानों की तरफ भाग गए। बैराम खाँ के निर्देश पर उसके सिपहसालार मौलाना पीर मोहम्मद खाँ ने हेमू के पिता को बंदी बना लिया और तलवार के वार से उनके वृद्ध शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। और उसने हेमू के समस्त वशधरों यानी सम्पूर्ण ढूसर भार्गव कुल को नष्ट करने का निश्चय किया। अलवर, रिवाड़ी नारनौल, आनौड़ आदि क्षेत्रों में बसे हुए दोसर वैश्य  कहलाए जाने वाले भार्गव जनों को चुन-चुन कर बंदी बनाया। साथ ही हेमू के अत्यन्त विश्वास पात्र अफ़गान अधिकारियों और सेवकों को भी नहीं बक्शा।
अपनी फ़तह के जश्न में उसने सभी बंदी ढूसर भार्गवों और सैनिकों के कटे हुए सिरों से एक विशाल मीनार बनवाई।

यह बात इतिहास में कुछ इस तरह कही जाती है-

साह कहीं बनियन को लाओ, मारो सबन जहाँ लगि पावो |
आहिदी गये पकड़ सब लाये, लाय झरोखों तारे दिखाए |
तब उजीर ने विनती किन्ही , चुक सबे दुसर सिर किन्ही |
उन्हें छोर तब दुसर ही पकडे, पकड़ पकड़ बेरहीन में जकडे |

हेमू के बाद दुसर वैश्य समाज के लोग हरियाणा व् दिल्ली से पूर्व की ओर पलायन करने लगे और गंगा के किनारे वर्तमान कानपूर एवं उन्नाव तथा रायबरेली के बैसवारा के क्षेत्रों में बस गये |

भारत के महान चक्रवर्ती सम्राटों विक्रमादित्य की दास्तान

चन्द्रगुप्त द्वितीय : गुप्त काल को भारत का स्वर्ण काल कहा जाता है। गुप्त वंश की स्थापना चन्द्रगुप्त प्रथम ने की थी। आरंभ में इनका शासन केवल मगध पर था, पर बाद में गुप्त वंश के राजाओं ने संपूर्ण उत्तर भारत को अपने अधीन करके दक्षिण में कांजीवरम के राजा से भी अपनी अधीनता स्वीकार कराई।

समुद्रगुप्त का पुत्र 'चन्द्रगुप्त द्वितीय' समस्त गुप्त राजाओं में सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से संपन्न था। शकों पर विजय प्राप्त करके उसने 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। वह 'शकारि' भी कहलाया। मालवा, काठियावाड़, गुजरात और उज्जयिनी को अपने साम्राज्य में मिलाकर उसने अपने पिता के राज्य का और भी विस्तार किया। चीनी यात्री फाह्यान उसके समय में 6 वर्षों तक भारत में रहा। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शासनकाल भारत के इतिहास का बड़ा महत्वपूर्ण समय माना जाता है। 

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में गुप्त साम्राज्य अपनी शक्ति की चरम सीमा पर पहुंच गया था। दक्षिणी भारत के जिन राजाओं को समुद्रगुप्त ने अपने अधीन किया था, वे अब भी अविकल रूप से चन्द्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करते थे। शक-महाक्षत्रपों और गांधार-कम्बोज के शक-मुरुण्डों के परास्त हो जाने से गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अरब सागर तक और हिन्दूकुश के पार वंक्षु नदी तक हो गया था। 

गुप्त वंश में अनेक प्रतापी राजा हुए- श्रीगुप्त, घटोत्कच, चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, रामगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य) और स्कंदगुप्त। चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त थी। उसके काल में भारत ने हर क्षेत्र में उन्नति की। उज्जैन के सम्राट गंधर्वसेन के पुत्र राजा विक्रमादित्य के नाम से चक्रवर्ती सम्राटों को ही विक्रमादित्य की उपाधि से सम्माननीय किया जाता था।

मौर्य वंश के बाद भारत में कुषाण, शक और शुंग वंश के शासकों का भारत के बहुत बड़े भू- भाग पर राज रहा। इन वंशों में भी कई महान और प्रतापी राजा हुए।

चन्द्रगुप्त मौर्य से विक्रमादित्य और फिर विक्रमादित्य से लेकर हर्षवर्धन तक कई प्रतापी राजा हुए।