Friday, April 18, 2014

धाकड क्षत्रिय देश

धाकड पुराण के अनुसार धाकड़ क्षत्रिय समूह का उद्भव महाभारत काल में हुआ। धाकड क्षत्रिय समूह लगभग बारहवीं शताब्दी के बाद एक जाति के रूप में परिणित हुआ। धाकड ऐतिहासिक क्षत्रिय वंशजों में से बने हुयेएक समूह का नाम है, जिसका मूल पेशा कृषि है। कालान्तर में यह जाति रूप में परिवर्तित हो गया। बहुत समय पहले की धाकड क्षत्रियों के विषय में यह कहावत सुनी जाती है- धाकड लाकड सायर सा, नर बारे नल वंश अर्थात् नर बर के राजा नल के वंशज धाकड सायर की लकडी के समान मजबूत थे। धाकड क्षत्रियों के विषय में एक अंग्रेज सेना नायक जेम्स मेड्रिड ने कहा था कि -धाकड क्षत्री अफगानी घोड ों की तरह मजबूत, कुशल तथा चतुर लडाकू हैं। आजकल धाकड शब्द का प्रयोग तेजतर्रार, वीरता और मजबूती का भाव प्रकट करने के लिए किया जाता है। जिससे जाहिर होता है कि किसी समय में धाकड क्षत्रियों का वैभव ऊॅचा रहा है। कुछ धाकड क्षत्रिय वंशज पृथ्वीराज तृतीय की राजसभा में धवल, सामन्त रहे थे जिनकी वीरता एवं वैभव का अनुभव पृथ्वीराजरासो ग्रन्थ की इस पंक्ति के द्वारा होता है- धब्बरे धाबर धक्करेै रण बंकरै। धाकड क्षत्रिय देश में नागर, मालव, किराड तीन उपसमूहों के रूप में प्रायः राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में पाये जाते हैं। धाकड श्री धरणीधर भगवान (बलदाऊ) जिन्हैं हलधर कहा जाता है, को अपना ईष्टदेव मानते हैं। श्री धरणीधर भगवान का नागर चाल क्षेत्र के मांडकला गांव में तथा जिला झालावाड के सुगर गांव में भव्य मन्दिर है। ऐतिहासिक वर्णनों एवं प्रमाणों के अनुसार बारहवीं शताब्दी से पूर्व सभी क्षत्रिय वंश शाखाओं के वंशजों को क्षत्रिय शब्द का ही प्रयोग होता था। लगभग बारहवीं-तेरहवीं शताबदी से राजवंशी क्षत्रियों को राजपूत तथा कृषिकर्मी क्षत्रियों को धाकड़ कहा जाने लगा। अतः धाकड सभी क्षत्रिय वंश शाखाओं में से बने हुए एक समूह का नाम है, जिनका मूल पेशा कृषि था। देशभर में धाकड जाति के लोग अधिकतर कृषि प्रधान ही मिलते हैं। पहले किसी की नौकरी करना धाकड जाति में घृणास्पद माना जाता था।उतम खेती , मध्यम व्यापार, कनिष्ठ चाकरी के कथनानुसार अब भी धाकड जाति में कर्मठ किसान पाये जाते हैं। वर्तमान में धाकड क्षत्रिय तीन उपसमूहों में विभकत हैं- नागर, मालव और किराड। इन उपसमूहों में परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध एवं रोटी बेटी व्यवहार होता है। धाकड जाति में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं है। धाकड जाति प्रायः राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में पाई जाती है

धाकड़ उत्पत्ति एवं उपसमूह:-
धाकड पुराण एवं पुस्तक वस्त्रभूषण के अनुसार महाभारत काल में योगिराज श्रीकृष्ण जो मुकट व वंशीधर रहे थे दाउबलराम जो हलधारण करने के कारण हलधर कहलाये ने पुरूषार्थी कृषकों को संगठित किया और कृषि कार्य को करते हुए क्षात्रधर्म का पालन करने के लिऐ प्रेरित किया, वे क्षत्री हीधाकड क्षत्रिय कहलाये। बलदाउजी को धरणीधर भी कहते हैं यह शेषनाग अवतार थे। उपरोक्त की पुनरावृति वि० सं.११४० में अजमेर के राजा बीसल देव के समय में हुई । जो कृषक क्षत्रीयत्व को भूलकर के कृषि कार्य में लगे हुए थे, साथ ही युद्ध में क्षत्रीयों के वीरगति को प्राप्त हो जाने से संखया कम हो रही थी। उस समय बीसल देव को उसके सहयोगी मालवा नरेश उदयादित्य परमार ने एक युक्ति बतलाई। तद्नुसार उन्होनें उन कृषकों को जो मूलतः क्षत्रीय ही थे, संगठित किया और उनके वह स्वयं ही अधिनायक बने। उस समूह का नाम उन्होंने धरा को खड करने वाला अर्थात् भूमि को जोतने वाला धरखड क्षत्रीय रखा। जो कालान्तर में परिवर्तित होकर धाकड कहलाया।

नागर चाल जागा की पोथी के अनुसार चौहानों की २४ शाखाओं में से एक शाखा दाईमा चौहान से राजा धरणीधर हुऐ, उन्होंने शस्त्र छोडकर (राजकार्य छोडकर )कृषि कार्य प्रारम्भ किया। श्री धरणीधर से ही धाकड नामकरण हुआ। राजा धरणीधर के चार पुत्र थे-' (१)शारपाल (२) वीरपाल (३) विशुपाल (४)वावनिया। जिनके उतरोतर वंश से चार शाखायें हुई :- १. शारपाल-सोलिया मेवाडा धाकड २. वीरपाल- नागर धाकड ३. विशुपाल-मालव धाकड ४. वावनिया-पुरवीया धाकड (किराड) कृषि व्यवसाय को अपनाकर वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर बस गये। स्थान (क्षेत्र) विशेष के आधार पर भी नामकरण पर प्रभाव पड़ा जैसे-नागर चाल बूंदी की सीमा व नागौर परगने में जाकर बसे वे नागर, मालवा में बसे वे मालव एवं पूर्वउतराचल में जाकर बसे वे किराड कहलाये।


लटूर जागा, कैथून जिला कोटा के अनुसार राजा बीसलदेव जी ने गढ अजमेर में राज किया। दिल्ली में राज किया । बीसलदेवजी के तपोधन पुत्र हुआ। तपोधन के धरणीधर पुत्र हुआ। धरणीधर के अजमल जी पुत्र हुआ। अजमलजी की धर्मपत्नी पूरणमलजी की कान कंवरबाई की पढीपात की पुत्री। जिनका पुत्र-नागराज जी, कानाजी, माधौजी, नेनगजी हूवा। दूजी धर्मपत्नी कीवसी की केसरबाई पोखरणा ब्राह्मण की। बेटा-धारू जी हुवा। १- नागराज जी- अन्तरवेद की धरती, नागर चाल में बंटया जिससे नागर धाकड हुए। १४० गोत्र। २- कानाजी- पूरब की धरती में बंटया जिससे किराड धाकड हुए। किराड गोत्र ३६० ३- माधोजी-डीडवाना की धरती में बंटया जिससे मेसरी (महेद्गवरी)धाकड हुऐ। गोत्र १४४ ४- नेनगजी-मालवा देश में बंटया,जिससे नथफोडा धाकड हुऐ। गोत्र १४२ ५- धारूजी -मालवा देश में बंटया, जिससे जनेउ कतरा माली (मालव)धाकड हुए। गोत्र१०९ उक्तांकित जागा लेखों के अनुसार धाकड जाति चौहान बंशी होनी चाहिए, जबकि धाकड जाति में सभी क्षत्रिय वश पाये जाते है। जागाओं की लिखने की लिपि एक अलग ही प्रकार की होती है जिसे मैं अपने शब्दों में अद्गुाद्ध लेखन लिपि ही कहूंगा। इन जागाओं के लेखों में कही की ईट कही का रोडा, भानवती ने कुनवा जोडा वाली कहावत चरितार्थ होती हैं। जिसके कारण इनके लेख ऐतिहासिक तथ्यों से पूर्णतया मेल नहीं खाते हैं। अन्ततः उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि धाकड जाति क्षत्रीय वर्ण की है। धाकड कृषि कर्मी क्षत्रीयों के एक समूह का नाम है, जिसमें सभी क्षत्रीय वंश पाये जाते हैं। धाकड समूह का उदभव महाभारत काल में हुआ वि०सं० ११४० में अजमेर के राजा बीसलदेव धाकड (धरखड)समूह के अधिनायक बने। कालान्तर में यह समूह धाकड जाति के रूप में परिणित हो गया। अजमेर के राजा वीसलदेव के समय में भंयकर युद्धाग्नि या अकाल से पीडित होने के कारण अथवा यह कहिए किसी भी कारणवश धाकड क्षत्रिय अजमेर छोड़कर यत्र-तत्र बस गये। पृथक-पृथक क्षेत्रों या स्थानों पर बसने के कारण क्षेत्रों या स्थानों के नाम पर ही पृथक-पृथक उपसमूहों का नामकरण हुआ ।

मालवा जागाओं की पोथी के अनुसार
अजमेर के राजा वीसलदेव चौहान थे। उनके समय में ब्राह्मणों का बड़ा बर्चस्व था, वह राजा से रूष्ट थे। उन्होंने कर एवं लगान देना बन्द कर दिया। तब बीसलदेव ने ब्राह्मणों को वश में करने के लिए मंत्री की सलाह से एक यज्ञ का आयोजन किया यज्ञ में नो लाख छत्तीस हजार ब्राह्मणों को ब्रह्मभोज का आयोजन था। भोजन में मास मिलाया गया जिससे कि उनका ब्रह्मत्व नष्ट हो जावे। जब ब्राह्मणो को भोजनपरोस दिया गया तब भोजन करते समय आकाशवाणी द्वारा उनको मालूम हुआ कि भोजन में मास मिला हुआ है, ब्राह्मण उठ खडे हुऐ और क्रोधित होकर श्राप देने लगे कि-हे राजा तेरा राज्य नष्ट हो जायेगा। श्राप देकर प्द्गचाताप करने लगे, कुछ ब्राह्मणों ने आत्महत्या भी कर ली शेष सब मिलकर धरणीधर ऋषि के पास विचार विमर्श करने पहुंचे। सारा वृतान्त ऋषि को सुनाया। ऋषि ने कहा कि तुम धर्म से विचलित हुऐ हो, तुम्हारा ब्रह्मत्व नष्ट हो चुका है। अतः अब तुम सब मिलकर एक साथ रहो तुमने धोखे से अभक्ष का भक्षण किया हैं। जिसके कारण आज से तुम्हारी जाति धाकड कहलायेगी। उस समय ब्राह्मणो ने अजमेर छोडने की प्रतिज्ञा की तथा स्वेच्छा से कृषि कार्य को अपना लिया। उपरोक्त लेखन से ऐसा प्रतीत होता है कि राजा बीसलदेव द्वारा किये गये यज्ञ आयोजन में सम्मलित होने वाले ब्राह्मण निराक्षत्री रह गये। जिन्होंने स्वेच्छा से कृषि कार्य को अपनाकर क्षात्रधर्म का पालन करनेलगें तथा अजमेर राज्य छोड कर यत्र तत्र बस गये।

किराड़:-
जोधपुर राज्य के परगने मालानी में बाडमेर से १० मील उतरपद्गिचम में प्राचीनऐतिहासिक नगर किराडू, किरारकोट या किरारकूट (किराडू) कहा जाने वाला ध्वंशावद्गोष के रूप में स्थित है। यहॉ परमार शासकों के मन्दिरों के खंडहर हैं। मूलनगर वीरान हो चुका है। किराडू परमारवंशी क्षत्रीयों की राजधानी रही थी। किराडू का संस्थापक एवं प्रथम शासक तथा किराडू का परमार वंश का प्रथम ऐतिहासिक पुरूष सिन्धुराज वि०.सं०९५६ से ९८१ तक रहा। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार ९वीं सदी से लेकर १३ वीं सदी तक किराडू पर परमार,सोलंकी वंशी क्षत्रीयों का शासन रहा । यवन आक्रमण काल में यवनों का भारत में मुखयतः समृद्वि गूजर और मालवा प्रदेश की ओर जाने का मार्ग किराडू होकर ही था। अतः सबसे पहले यवनों का सामना किरार कोट (किराडू)को ही करना पडता था। अतः (कि=करना, रार=लडाई कोट =किला)इस नगर का किरार कोट या किरार कूट नाम पडने का यही कारण है। किरार कोट या किरार कूट का रूपान्तर शब्द किरारू या किराडू कहलाया। किरारू का अर्थ है (कि=करना, रारू =लडाकू)अर्थात लडाई करने वाले। राजस्थानी भाषा में  का उच्चारण  किया जाता है। जिसके कारण किरारू शब्द को किराडू कहा जाता हैं

मालव:-
मालव नाम की एक प्राचीन जाति थी। मालव जाति के लोगों ने आकर (पूर्वी मालवा), अवन्ति (पद्गिचमी मालवा),उज्जैन तथा उसके आस-पास के भागों पर अपना अधिकार जमाया तो उन्होंने अपना अधीन किये हुए इलाकों का सामूहिक नाम मालवा प्रदेश रखा। प्रतापगढ, कोटा, झालावाड तथा कुछ हिस्सा टोंक का मालवा प्रदेश के अर्न्तगत ही था। मलवा पर परमार वंशी क्षत्रियों का भी राज्य रहा। वि.सं. १०२८ से १०५४ तक के समय में मालवा का परमार वंशी राजा मुंज रहा। उसके दरबार के पंडित हलायुद्ध ने -- पिंगल सूत्र विधि में मुंज को ब्रह्म क्षत्र कुल का कहा है। ब्रह्मक्षत्र शब्द का अर्थ है, जिसमें ब्रह्मत्व एवं क्षत्रत्व दोनों का गुण विद्यमान हों या जिनके पूर्वज ब्राह्मण से क्षत्रिय हो गये हों। अतः राजा मुंज के समय तक परमार वंद्गिायों को ब्रह्मक्षत्र कहा गया। प्रसिद्ध इतिहासकार डा. दशरथ शर्मा ने बिजौलिया लेख के आधार पर चौहानों को ब्राह्मणों की सन्तान बतलाया है। कर्नल टांड ने चौहानों को विदेशी माना है। प्रतिहार वंशी क्षत्रियों को जब बौद्ध धम्र से वापस वैदिक धर्म में दीक्षित कर (अग्नि साक्षी संस्कार कर ) लिया गया तो उनके मूल पुरूष को यज्ञप्रतिहार कहा गया। इसकी एक शाखा मालवा में जाकर रही थी। पृथ्वीराज राशो में परमार, चौहान, सौलंकी, प्रतिहार (परिहार )वंशों को अग्निवंशी लिखा है। अग्निवंश का तात्पर्य है कि इनके मूल पुरूष क्षत्रिय नहीं थे, जिससे उनको अग्नि साक्षी का संस्कार कर क्षत्रियों में मिला लिया । मालव धाकड अग्निवंद् गाी क्षत्रिय है। अजमेर के राजा वीसलदेव ने ब्राह्मणों को वश में करने के लिये एक यज्ञ किया था। उस यज्ञ में सम्मिलित होने वाले ब्राह्मणों (ब्रह्मक्षत्रों) को धोखे से भोजन में मांस खिला दिया गया। जिससे उनका ब्रह्मत्व नष्ट हो गया उनका ब्रह्मत्व नष्ट हो गया उनका ब्रह्मत्व नष्ट हो जाने पर जो अजमेर को छोडकर मालवा प्रदेश में आकर बस गये और कृषि कार्य करने लगे या यवनों के आक्रमण के कारण जो कृषि कर्मी क्षत्रीय मालवा में आकर बस गये तथा जो आरम्भ से ही मालवा प्रदेश के रहने वाले थे, कृषक क्षत्रीय मालवधाकड कहलाये। मुखयतः मालव धाकडों में अग्निवंशी क्षत्रिय हैं। इतिहासकारों ने परमार (ब्रह्ममक्षत्र)चौहान,सोलंकी प्रतिहार क्षत्रीय वंशोें को अग्निवंश में माना है मालव धाकडों को मेवाडा एवं सोलिया भी कहा जाता है। यह फर्क क्षेत्रीयतानुसार प्रतीत होता है।

नागर:-
अजमेर के राजा बीसलदेव के शासन काल में उत्तर पद्गिचम की तरफ खैबर के दर्रे से मुसलमानों के लगातार आक्रमण के कारण साथ ही भीषण अकाल पड़ने के कारण उसके राज्य में अव्यवस्था उत्पन्न हो गई। किसान तबाह हो गये, खेती बाडी नष्ट हो गयी, जनजीवन त्रस्त हो गया। फलस्वरूप वहां से अधिकाशं कृषक क्षत्रिय (धरखड-धाकड)पलायन कर सुविधानुसार बस गये। जो नागर चाल (उण्यिारा बूंदीकी सीमा ) और नागौर परगने में जाकर बसे थे, मूलतः नागर धाकड कहलाये। वर्तमान में जयपुर, अलवर, भरतपुर, करौली, आगरा, मथुरा जिलों में भी नागर धाकड रहते हैं

गुप्त राजवंश

गुप्त राजवंश या गुप्त वंश प्राचीन भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था। इसे भारत का एक स्वर्ण युग माना जाता है।
मौर्य वंश के पतन के बाद दीर्घकाल तक भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं रही। कुषाण एवं सातवाहनों ने राजनीतिक एकता लाने का प्रयास किया। मौर्योत्तर काल के उपरान्त तीसरी शताब्दी इ. में तीन राजवंशो का उदय हुआ जिसमें मध्य भारत में नाग शक्‍ति, दक्षिण में बाकाटक तथा पूर्वी में गुप्त वंश प्रमुख हैं। मौर्य वंश के पतन के पश्चात नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनस्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को है।
गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का प्रारम्भिक राज्य आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार में था।

अनुक्रम

  

Thursday, April 17, 2014

चन्द्र गुप्त मौर्य एक महान वैश्य-CHANDRAGUPTA MOURYA A GREAT VAISHYA

चन्द्र गुप्त मौर्य एक महान वैश्य-CHANDRAGUPTA MOURYA A GREAT VAISHYA



सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य एक वैश्य जाति माहुरी से सम्बन्ध रखता था। गुजरात का





राज्यपाल पुष्पगुप्त जो की उसका बहनोई था वह भी एक वैश्य था। गुप्त या

गुप्ता उपनाम केवल वैश्य ही प्रयोग करते थे , ओर करते हैं । चन्द्रगुप्त ने बाद

में जैन धर्म अपना लिया था, जैन पूरी तरह से एक वैश्य जाती हैं. १००% जैन वैश्य हैं।

माहुरी जाति अपने आप को चन्द्रगुप्त का वंशज मानती हैं। जो की बिहार के गया

जिले में निवास करती हैं। मौर्य उपनाम चन्द्रगुप्त को चाणक्य ने दिया था।





क्योंकि चन्द्रगुप्त कि माँ का नाम मुरा था। मुरा से ही मौर्य बना। चन्द्रगुप्त की पत्नी

एक वैश्य नगर सेठ की पुत्री थी। चन्द्रगुप्त की कुलदेवी माता लक्ष्मी थी।

जो की वैश्य समुदाय की कुल देवी मानी जाती हैं। चन्द्रगुप्त के समय में जो विदेशी

इतिहासकार भारत में आयें उन्होंने भी चन्द्रगुप्त को वैश्य ही बताया था।

इतिहास में उसका कही भी क्षत्रिय होने का प्रमाण नहीं मिलता हैं। नाही शुद्र होने का,

क्योंकि एक ब्रहामण चाणक्य कभी भी एक शुद्र को शिक्षा नहीं दे सकते थे।




राजा को हमेशा क्षत्रिय माना गया हैं, वैश्य समुदाय की अधिकतर जातियों की उत्पत्ति



क्षत्रियो से ही हुईं हैं। जो की एक इतिहास हैं। भारत मैं हर जाति व समुदाय का

शासन रहा हैं। आधुनिक इतिहासकारों को कोई भी राजा व सम्राट, वैश्य व शुद्र होना

हज़म नहीं होता हैं। चन्द्रगुप्त के पोते सम्राट अशोक की पत्नी भी एक वैश्य पुत्री थी।

ज़ाहिर हैं रिश्ते नाते आदमी अपने वर्ण या जातिं में ही करते रहे हैं। ये प्रमाण

सिद्ध करते हैं। कि चन्द्रगुप्त मौर्या और सम्राट अशोक वैश्य ही थे।

Tuesday, April 15, 2014

सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य - HEMU VIKRAMADITYA

सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य या केवल हेमू (१५०१-१५५६) एक हिन्दू राजा था, जिसने मध्यकाल में १६वीं शताब्दी में भारत पर राज किया था। यह भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण समय रहा जब मुगल एवं अफगान वंश, दोनों ही दिल्ली में राज्य के लिये तत्पर थे। कई इतिहसकारों ने हेमू को 'भारत का नैपोलियन' कहा है |

      
16वीं शताब्दी में एक नाम हेमू का आता है। महाराज हेमचन्द्र विक्रमादित्य वह विद्युत की भांति चमके और देदीप्यमान हुए। हेमू दोसर वैश्य  भार्गव वंश के गोलिश गोत्र में उत्पन्न राय जयपाल के पौत्र और पूरनमाल के पुत्र थे। हेमू का एक दूसरा नाम हेमू बनिया बक्कल भी था.  हेमू 16वीं शताब्दी का सबसे अधिक विलक्षण सेनानायक था । राजा विक्रमाजीत हेमू जन्म से मेवात स्थित रिवाड़ी के हिंदू थे जो अपने वैयक्तिक गुणों तथा कार्यकुशलता के कारण यह सूर सम्राट् आदिलशाह के दरबार का प्रधान मंत्री बन गया थे। यह राज्य कार्यो का संचालन बड़े योग्यता पूर्वक करते थे। आदिलशाह स्वयं अयोग्य थे और अपने कार्यों का भार वह हेमू पर डाले रहते थे।
जिस समय हुमायूँ की मृत्यु हुई उस समय आदिलशाह मिर्जापुर के पास चुनार में रह रहे थे। हुमायूँ की मृत्यु का समाचार सुनकर हेमू अपने स्वामी की ओर से युद्ध करने के लिए दिल्ली की ओर चल पड़े। वह ग्वालियर होते हुए आगे बढे और उसने आगरा तथा दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया। तरदीबेग खाँ दिल्ली की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया था। हेमू ने बेग को हरा दिया और वह दिल्ली छोड़कर भाग गया।
इस विजय से हेमू के पास काफी धन, लगभग 1500 हाथी तथा एक विशाल सेना एकत्र हो गई थी। उन्होंने अफगान सेना की कुछ टुकड़ियों को प्रचुर धन देकर अपनी ओर कर लिया। तत्पश्चात्‌ उन्होंने प्राचीन काल के अनेक प्रसिद्ध हिंदू राजाओं की उपाधि धारण की और अपने को 'राजा विक्रमादित्य' अथवा विक्रमाजीत कहने लगे। इसके बाद वह अकबर तथा बैरम खाँ से लड़ने के लिए पानीपत के ऐतिहासिक युद्धक्षेत्र में जा डटे। 5 नवंबर, 1556 को युद्ध प्रारंभ हुआ। इतिहास में यह युद्ध पानीपत के दूसरे युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। हेमू की सेना संख्या में अधिक थी तथा उसका तोपखाना भी अच्छा था किंतु एक तीर सम्राट हेमचन्द्र की आँख को छेदता हुआ सिर तक चला गया। हेमचन्द्र ने हिम्मत न हारते हुए तीर को बाहर निकाला परन्तु इस प्रयास में पूरी की पूरी आँख तीर के साथ बाहर आ गई। आपने अपने रूमाल को आँख पर लगाकर कुछ देर लड़ाई का संचालन किया, परन्तु शीघ्र ही बेहोश होकर अपने ``हवाई´´ नामक हाथी के हौदे में गिर पड़े।
शहर के कतोपुर स्थित साधारण परिवार से निकलकर अंतिम हिंदू सम्राट होने का गौरव प्राप्त करने वाले राजा हेमचंद विक्रमादित्य 7 अक्टूबर 1556 को मुगलों को हराकर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए थे।
आपका महावत आपको युद्ध के मैदान से बाहर निकाल रहा था कि मुगल सेनापति अली कुली खान ``हवाई´´ हाथी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा और बेहोश हेमू को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गया। इस प्रकार दुर्भाग्यवश सम्राट हेमचन्द्र एक जीता हुआ युद्ध हार गये और भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र दोसर वैश्य  (भार्गव) वंश का शासन 29 दिन के बाद समाप्त हो गया।
बैराम खाँ के लिए यह घटना एकदम अप्रत्याशित थी। बैराम खाँ ने अकबर से प्रार्थना की कि हेमू का वध करके वह `गाज़ी´ की पदवी का हक़दार बने। आनन-फानन में अचेत हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया। जिससे हेमू के समर्थकों की हिम्मत या भविष्य के विद्रोह की संभावना को पूरी तरह कुचल दिया जाय।
दिल्ली पर अधिकार हो जाने के बाद बैराम खाँ ने हेमू के सभी वंशधरों का क़त्लेआम करने का निश्चय किया। हेमू के समर्थक अफ़ग़ान अमीर और सामन्त या तो मारे गए या फिर दूर-दराज़ के ठिकानों की तरफ भाग गए। बैराम खाँ के निर्देश पर उसके सिपहसालार मौलाना पीर मोहम्मद खाँ ने हेमू के पिता को बंदी बना लिया और तलवार के वार से उनके वृद्ध शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। और उसने हेमू के समस्त वशधरों यानी सम्पूर्ण ढूसर भार्गव कुल को नष्ट करने का निश्चय किया। अलवर, रिवाड़ी नारनौल, आनौड़ आदि क्षेत्रों में बसे हुए दोसर वैश्य  कहलाए जाने वाले भार्गव जनों को चुन-चुन कर बंदी बनाया। साथ ही हेमू के अत्यन्त विश्वास पात्र अफ़गान अधिकारियों और सेवकों को भी नहीं बक्शा।
अपनी फ़तह के जश्न में उसने सभी बंदी ढूसर भार्गवों और सैनिकों के कटे हुए सिरों से एक विशाल मीनार बनवाई।

यह बात इतिहास में कुछ इस तरह कही जाती है-

साह कहीं बनियन को लाओ, मारो सबन जहाँ लगि पावो |
आहिदी गये पकड़ सब लाये, लाय झरोखों तारे दिखाए |
तब उजीर ने विनती किन्ही , चुक सबे दुसर सिर किन्ही |
उन्हें छोर तब दुसर ही पकडे, पकड़ पकड़ बेरहीन में जकडे |

हेमू के बाद दुसर वैश्य समाज के लोग हरियाणा व् दिल्ली से पूर्व की ओर पलायन करने लगे और गंगा के किनारे वर्तमान कानपूर एवं उन्नाव तथा रायबरेली के बैसवारा के क्षेत्रों में बस गये |

भारत के महान चक्रवर्ती सम्राटों विक्रमादित्य की दास्तान

चन्द्रगुप्त द्वितीय : गुप्त काल को भारत का स्वर्ण काल कहा जाता है। गुप्त वंश की स्थापना चन्द्रगुप्त प्रथम ने की थी। आरंभ में इनका शासन केवल मगध पर था, पर बाद में गुप्त वंश के राजाओं ने संपूर्ण उत्तर भारत को अपने अधीन करके दक्षिण में कांजीवरम के राजा से भी अपनी अधीनता स्वीकार कराई।

समुद्रगुप्त का पुत्र 'चन्द्रगुप्त द्वितीय' समस्त गुप्त राजाओं में सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से संपन्न था। शकों पर विजय प्राप्त करके उसने 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। वह 'शकारि' भी कहलाया। मालवा, काठियावाड़, गुजरात और उज्जयिनी को अपने साम्राज्य में मिलाकर उसने अपने पिता के राज्य का और भी विस्तार किया। चीनी यात्री फाह्यान उसके समय में 6 वर्षों तक भारत में रहा। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शासनकाल भारत के इतिहास का बड़ा महत्वपूर्ण समय माना जाता है। 

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में गुप्त साम्राज्य अपनी शक्ति की चरम सीमा पर पहुंच गया था। दक्षिणी भारत के जिन राजाओं को समुद्रगुप्त ने अपने अधीन किया था, वे अब भी अविकल रूप से चन्द्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करते थे। शक-महाक्षत्रपों और गांधार-कम्बोज के शक-मुरुण्डों के परास्त हो जाने से गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अरब सागर तक और हिन्दूकुश के पार वंक्षु नदी तक हो गया था। 

गुप्त वंश में अनेक प्रतापी राजा हुए- श्रीगुप्त, घटोत्कच, चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, रामगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य) और स्कंदगुप्त। चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त थी। उसके काल में भारत ने हर क्षेत्र में उन्नति की। उज्जैन के सम्राट गंधर्वसेन के पुत्र राजा विक्रमादित्य के नाम से चक्रवर्ती सम्राटों को ही विक्रमादित्य की उपाधि से सम्माननीय किया जाता था।

मौर्य वंश के बाद भारत में कुषाण, शक और शुंग वंश के शासकों का भारत के बहुत बड़े भू- भाग पर राज रहा। इन वंशों में भी कई महान और प्रतापी राजा हुए।

चन्द्रगुप्त मौर्य से विक्रमादित्य और फिर विक्रमादित्य से लेकर हर्षवर्धन तक कई प्रतापी राजा हुए।

Monday, April 14, 2014

विक्रम संवत् (विक्रम युग)..विक्रम संवत के सुरवात राजा विक्रमादित्य के सम्यसे होते आरहा है।

विक्रम संवत के सुरवात राजा विक्रमादित्य के सम्यसे होते आरहा है।

भारत और नेपाल की हिंदू परंपरा में व्यापक रूप से प्रयुक्त प्राचीन पंचाग हैं विक्रम संवत् या विक्रम युग. कहा जाता है कि ईसा पूर्व 56 में शकों पर अपनी जीत के बाद राजा ने इसकी शुरूआत की थी.


विक्रम संवत हिन्दू पंचांग में समय गणना की प्रणाली का नाम है। यह संवत ५७ ईपू आरम्भ होती है। इसका प्रणेता सम्राट विक्रमादित्य को माना जाता है। कालिदास इस महाराजा के एक रत्न माने जाते हैं।
बारह महीने का एक वर्ष और सात दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ | महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है | यह बारह राशियाँ बारह सौर मास हैं | जिस दिन सूर्य जिस राशि मे प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है | पूर्णिमा के दिन ,चंद्रमा जिस नक्षत्र मे होता है | उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है | चंद्र वर्ष सौर वर्ष से 11 दिन 3 घाटी 48 पल छोटा है | इसीलिए हर 3 वर्ष मे इसमे 1 महीना जोड़ दिया जाता है |
यह चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन से शुरू होता है। वर्ष २०१3 (इसा) में यह १1 अप्रेल को शुरु हुआ।

महीनों के नाम[संपादित करें]

महीनों के नामपूर्णिम के दिन नक्षत्र जिस्मे चन्द्रमा होता है
चैत्रचित्रा , स्वाति
बैशाखविशाखा , अनुराधा
जेष्ठजेष्ठा , मूल
आषाढ़पूर्वाषाढ़ , उत्तराषाढ़ , सतभिषा
श्रावणश्रवण , धनिष्ठा
भाद्रपदपूर्वाभाद्र , उत्तरभाद्र
आश्विनअश्विन , रेवती , भरणी
कार्तिककृतिका , रोहणी
मार्गशीर्षमृगशिरा , उत्तरा
पौषपुनवर्सु ,पुष्य
माघमघा , अश्लेशा
फाल्गुनपूर्वाफाल्गुन , उत्तरफाल्गुन , हस्त

जैन मुनि की कथा....

ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भूमि पर एक साम्रराज्य था मालव गण। मालव गण की राजधानी थी भारत की प्रसिद्ध नगरी उज्जेन । उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था । प्रजावात्सल्या राजा नाबोवाहन की म्रत्यु के पश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने "महाराजाधिराज मालवाधिपति"की उपाधि धारण करके मालव गण को राजतन्त्र में बदल दिया । उस समय भारत में चार शक शासको का राज्य था। शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश हो गया। एकं बार मालव गण की राजधानी में एक जैन साध्वी पधारी।उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण गंधर्व सेन भी उनके दर्शन करने पहुच गया । साध्वी के रूप ने उन्हें कामांध बना दिया। महाराज ने साध्वी का अपहरण कर लिया तथा साध्वी के साथ जबरदस्ती विवाह कर लिया। अपनी बहन साध्वी के अपहरण के बाद उनके भाई जैन मुनि कलिकाचार्य ने राष्ट्र्यद्रोह करके बदले की भावना से शक राजाओं को उज्जैन पर हमला करने के लिए तैयार कर लिया। शक राजाओं ने चारों और से आक्रमण करके उज्जैन नगरी को जीत लिया.शोषद वहाँ का शासक बना दिया गया। गंधर्व सेन साध्वी और अपनी रानी सोम्यादर्शन के साथ विन्धयाचल के वनों में छुप गये.साध्वी सरस्वती ने महारानी सोम्या से बहुत दुलार पाया तथा साध्वी ने भी गंधर्व सेन को अपना पति स्वीकार कर लिया । वनों में निवास करते हुए,सरस्वती ने एक पुत्र को जनम दिया, जिसका नाम भरत हरी रक्खा गया.उसके तीन वर्ष पश्चात महारानी सोम्या ने भी एक पुत्र को जनम दिया.जिसका नाम विक्रम सेन रक्खा गया। विंध्याचल के वनों में निवास करते हुए एक दिन गंधर्व सेन आखेट को गये,जहाँ वे एक सिंह का शिकार हो गये। वहीं साध्वी सरस्वती भी अपने भाई जैन मुनि कलिकाचार्य के राष्ट्र द्रोह से छुब्द थी।महाराज की म्रत्यु के पशचात उनहोने भी अपने पुत्र भ्रत्हरी को महारानी को सोंपकर अन्न का त्याग कर दिया।और अपने प्राण त्याग दिए। उसके पश्चात महारानी सोम्या दोनों पुत्रों को लेकर कृषण भगवान् की नगरी चली गई,तथा वहाँ पर आज्ञातवास काटने लगी। दोनों राजकुमारों में भ्रताहरी चिंतन शील बालकथा,तथा विक्रम में एक असाधारण योद्धा के सभी गुन विद्यमान थे। अब समय धीरे धीरे समय अपनी कालपरिक्र्मा पर तेजी से आगे बढने लगा। दोनों राजकुमारों को पता चल चुका था की शको ने उनके पिता को हराकर उज्जैन पर अधिकार कर लिया था,तथा शक दशको से भारतीय जनता पर अत्याचार कर रहे है।विक्रम जब युवा हुआ तब वह एक सुगतित शरीर का स्वामी व एक महान योद्धा बन चुका था। धनुषबाण, खडग, असी,त्रिसूल,व परशु आदि में उसका कोई सानी नही था.अपनी नेत्रत्व्य करने की छमता के कारन उसने एक सैन्य दल भी गठित कर लिया था। अब समय आ गया था ,की भारतवर्ष को शकों से छुटकारा दिलाया जाय।वीर विक्रम सेन ने अपने मित्रो को संदेश भेजकर बुला लिया.सभाओं व मंत्रणा के दौर शुरू हो गए। निर्णय लिया गया की ,सर्वप्रथम उज्जैन में जमे शक राज शोशाद व उसके भतीजे खारोस को युद्ध में पराजित करना होगा।परन्तु एक अड़चन थीकि, उज्जैन पर आक्रमण के समय सौराष्ट्र का शकराज भुमक व तक्षिला का शकराज कुशुलुक शोशाद की साहयता के लिए आयेंगे। विक्रम ने कहा की, शक राजाओं के पास विशाल सेनाये है,संग्राम भयंकर होगा,तो उसके मित्रो ने उसे आश्वासन दियाकी, जब तक आप उज्जैन नगरी को नही जीत लेंगे ,तब तक सौराष्ट्र व तक्षिला की सेनाओं को हम आप के पास फटकने भी न देंगे। विक्रम सेन के इन मित्रों में सौवीर गन राज्य का युवराज प्रधुम्न, कुनिंद गन राज्य का युवराज भद्रबाहु,अमर्गुप्त आदि प्रमुख थे। अब सर्वप्रथम सेना की संख्या को बढ़ाना व उसको सुद्रढ़ करना था। सेना की संख्या बढ़ाने के लिए गावं गावं के शिव मंदिरों में भैरव भक्त के नाम से गावों के युवकों को भरती किया जाने लगा। सभी युवकों को त्रिशूल प्रदान किए गए। युवकों को पास के वनों में शास्त्राभ्यास कराया जाने लगा.इस कार्य में वनीय छेत्र बहुत साहयता कर रहा था। इतना बड़ा कार्य होने के बाद भी शकों को कानोकान भनक भी नही लगी. कुछ ही समय में भैरव सैनिकों की संख्या लगभग ५० सहस्त्र हो गई.भारत वर्ष के वर्तमान की हलचल देखकर भारत का भविष्य अपने सुनहरे वर्तमान की कल्पना करने लगा। लगभग दो वर्ष भाग दौर में बीत गए.इसी बीच विक्रम को एक नया सहयोगी मिल गया अपिलक। अपिलक आन्ध्र के महाराजा शिवमुख का अनुज था। अपिलक को भैरव सेना का सेनापति बना दिया गया। धन की व्यवस्था का भार अमर्गुप्त को सोपा गया। अब जहाँ भारत का भविष्य एक चक्रवाती सम्राट के स्वागत के लिए आतुर था,वहीं चारो शक राजा भारतीय जनता का शोषण कर रहे थे और विलासी जीवन में लिप्त थे। इशा की प्रथम शताब्दी में महाकुम्भ के अवसर पर सभी भैरव सेनिको को साधू-संतो के वेश में उज्जैन के सैकडो गावों के मंदिरों में ठहरा दिया गया .प्रय्तेक गाँव का आर मन्दिर मनो शिव के टांडाव् के लिए भूमि तैयार कर रहा था। महाकुम्भ का स्नान समाप्त होते ही सैनिको ने अपना अभियान शुरू कर दिया। भैरव सेना ने उज्जैन व विदिशा को घेर लिया gayaa . भीषण संग्राम हुआ। विदेशी शकों को बुरी तरह काट डाला गया। उज्जैन का शासक शोषद भाग खड़ा हुआ.तथा मथुरा के शासक का पुत्र खारोश विदिशा के युद्ध में मारा गया। इस समाचार को सुनते ही सौराष्ट्र व मथुरा के शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया। अब विक्रम के मित्रों की बारी थी, उन्होंने सौराष्ट्र के शासक भुमक को भैरव सेना के साथ राह में ही घेर लिया,तथा उसको बुरी तरह पराजित किया, तथा अपने मित्र को दिया वचन पूरा किया। मथुरा के शक राजा राज्बुल से विक्रम स्वम टकरा गया और उसे बंदी बना लिया। आंध्र महाराज सत्कारणी के अनुज अपिलक के नेत्र्तव्य में पुरे मध्य भारत में भैरव सेना ने अपने तांडव से शक सेनाओं को समाप्त कर दिया। विक्रम सेन ने अपने भ्राता भरथरी को उज्जैन का शासक नियुक्त कराया। तीनो शक राजाओं के पराजित होने के बाद ताछ्शिला के शक रजा कुशुलुक ने भी विक्रम से संधि कर ली। मथुरा के शासक की महारानी ने विक्रम की माता सौम्या से मिलकर छमा मांगी तथा अपनी पुत्री हंसा के लिए विक्रम का हाथ मांगा । महारानी सौम्या ने उस बंधन को तुंरत स्वीकार कर लिया। विक्रम के भ्राता भरथरी का मन शासन से अधिक ध्यान व योग में लगता था इसलिए उन्होंने राजपाट त्याग कर सन्यास ले लिया। उज्जैन नगरी के राजकुमार ने पुन: वर्षों पश्चात गणतंत्र की स्थापना की व्यवस्था की परन्तु मित्रों व जनता के आग्रह पर विक्रम सेन को महाराजाधिराज विक्र्माद्वित्य के नाम से सिंहासन पर आसीत् होना पडा। लाखों की संख्या में शकों का याघ्होपवीत हुआ। शक हिंदू संस्कृति में ऐसे समां गए जैसे एक नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है। विदेशी शकों के aakramano से भारत मुक्त हुआ तथा हिंदू संस्क्रती का प्रसार समस्त विश्व में हुआ। इसी शक विजय के उपरांत इशा से ५७ वर्ष पूर्व महाराजा विक्रमाद्व्टी के राज्याभिषेक पर विक्रमी संवत की स्थापना हुई। आगे आने वाले कई चक्रवाती सम्राटों ने इन्ही सम्राट विक्रमादित्य के नाम की उपाधि धारण की.

नौ रत्न और उज्जैन में विक्रमादित्य का दरबार..

भारतीय परंपरा के अनुसार धनवंतरी, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट (या (बेतालभट्ट), वररुचि, और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे. कहते हैं कि राजा के पास "नवरत्न" कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे.
कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे. वरामिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी.वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे. माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना "नीति -प्रदीप" (Niti-pradīpa सचमुच "आचरण का दीया") का श्रेय दिया है.
विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि
धन्वन्तरिः क्षपणको मरसिंह शंकू वेताळभट्ट घट कर्पर कालिदासाः। ख्यातो वराह मिहिरो नृपते स्सभायां रत्नानि वै वररुचि र्नव विक्रमस्य।।

विक्रम और शनि.

शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है. कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था. अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी. ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की. समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है. लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था. इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं. विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था. जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधिक हो गए. उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे. जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है. विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे. विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि "जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा" और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं.
एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है. घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं - जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था. इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है. विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे. विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया. विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया. दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया. विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे. जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया. उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा. विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं. चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे. ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा.
किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए. जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी. जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई. लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है, और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया. बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा. भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया. वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी. धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी. उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया. वह सो गई. जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है. जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं. उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है.
विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया. राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए. जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया. उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं. वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं. उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं. वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं. वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं.
एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है. वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं. इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं - नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा. वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है. राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है. वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं. उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है. अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं. वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था. शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं. विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें. वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे. शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे. राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं. उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं. वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है. विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं.

विक्रमादित्य की पौराणिक कथा ||

अनुश्रुत विक्रमादित्य, संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं, दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है. उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है, जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हों, हालांकि उनके इर्द-गिर्द कहानियों का पूरा चक्र फला-फूला है. संस्कृत की सर्वाधिक लोकप्रिय दो कथा-श्रृंखलाएं हैं वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी ("पिशाच की 25 कहानियां") और सिंहासन-द्वात्रिंशिका ("सिंहासन की 32 कहानियां" जो सिहांसन बत्तीसी के नाम से भी विख्यात हैं). इन दोनों के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं.
पिशाच (बेताल) की कहानियों में बेताल, पच्चीस कहानियां सुनाता है, जिसमें राजा बेताल को बंदी बनाना चाहता है, और वह राजा को उलझन पैदा करने वाली कहानियां सुनाता है और उनका अंत राजा के समक्ष एक प्रश्न रखते हुए करता है. वस्तुतः पहले एक साधु, राजा से विनती करते हैं कि वे बेताल से बिना कोई शब्द बोले उसे उनके पास ले आएं, नहीं तो बेताल उड़ कर वापस अपनी जगह चला जाएगा. राजा केवल उस स्थिति में ही चुप रह सकते थे, जब वे उत्तर न जानते हों, अन्यथा राजा का सिर फट जाता. दुर्भाग्यवश, राजा को पता चलता है कि वे उसके सारे सवालों का जवाब जानते हैं; इसीलिए विक्रमादित्य को उलझन में डालने वाले अंतिम सवाल तक, बेताल को पकड़ने और फिर उसके छूट जाने का सिलसिला चौबीस बार चलता है. इन कहानियों का एक रूपांतरण कथा-सरित्सागर में देखा जा सकता है.
सिंहासन के क़िस्से, विक्रमादित्य के उस सिंहासन से जुड़े हुए हैं जो खो गया था, और कई सदियों बाद धार के परमार राजा भोज द्वारा बरामद किया गया था. स्वयं राजा भोज भी काफ़ी प्रसिद्ध थे और कहानियों की यह श्रृंखला उनके सिंहासन पर बैठने के प्रयासों के बारे में है. इस सिंहासन में 32 पुतलियां लगी हुई थीं, जो बोल सकती थीं, और राजा को चुनौती देती हैं कि राजा केवल उस स्थिति में ही सिंहासन पर बैठ सकते हैं, यदि वे उनके द्वारा सुनाई जाने वाली कहानी में विक्रमादित्य की तरह उदार हैं. इससे विक्रमादित्य की 32 कोशिशें (और 32 कहानियां) सामने आती हैं और हर बार भोज अपनी हीनता स्वीकार करते हैं. अंत में पुतलियां उनकी विनम्रता से प्रसन्न होकर उन्हें सिंहासन पर बैठने देती हैं.

विक्रमादित्य संस्कृत

गुप्त राजा के लिए, चंद्रगुप्त II विक्रमादित्य देखें
विक्रमादित्य संस्कृतविक्रमादित्य (ई.पू.102 से 15 ईस्वी तक) उज्जैनभारत के अनुश्रुत राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे. "विक्रमादित्य" की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें उल्लेखनीय हैं गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे). राजा विक्रमादित्य नाम, विक्रमvikrama यानी "शौर्य" और आदित्य[[|Āditya]] , यानी अदिति के पुत्र के अर्थ सहित संस्कृत का तत्पुरुष है. अदिति अथवा आदित्या के सबसे प्रसिद्ध पुत्रों में से एक हैं देवता सूर्य, अतः विक्रमादित्य का अर्थ है सूर्य, यानी "सूर्य के बराबर वीरता (वाला)". उन्हें विक्रम या विक्रमार्क भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है).
विक्रमादित्य ईसा पूर्व पहली सदी के हैं. कथा सरित्सागर के अनुसार वे उज्जैन परमार वंश के राजा महेंद्रादित्य के पुत्र थे. हालांकि इसका उल्लेख लगभग 12 शताब्दियों के बाद किया गया था. इसके अलावा, अन्य स्रोतों के अनुसार विक्रमादित्य को दिल्ली के तुअर राजवंश का पूर्वज माना जाता है.[1][2][3][4][5]
हिन्दू शिशुओं में विक्रम नामकरण के बढ़ते प्रचलन का श्रेय आंशिक रूप से विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के बारे में लोकप्रिय लोक कथाओं की दो श्रृंखलाओं को दिया जा सकता है.

नव वर्षक आ जुड-शितल सिरुवा पर्ब के हार्दिक मंगलमय शुभकामना ।


मेरे प्रिय समस्त देव, चौधरी, पौदार स्वजाति & मित्रगन आप सभी माहनुभाओ का आभिवादन नव वर्ष संवत २०७१ की हार्दिक बधाई  नव वर्ष २०७१ क हार्दिक शुभकामना ।

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सम्पूर्ण मधेश प्रेमी,मधेशी जनता ,स्वजाति,मित्र-गण, भाई, बहन, दोस्त, मधेश के हमारे भाई बहन आ मधेश के अन्य हमारे अत्मजन एबम बिसिस्ट महानुभाब लोग्नी आप सभी को जुड-शितल सिरुवा पर्ब हार्दिक मङ्गलमय शुभकामना जुड-शितल सिरुवा पर्ब के नव उमंगमे नव तरंगमे, अहाँक हृदय नव उत्सवसँ भरए, मनमे शान्ति, सफलता जिवनमे, नव स्वप्नसँ नयन सदति भरल रह………।

जुड-शितल सिरुवा पर्ब के हार्दिक मंगलमय शुभकामना ।नया साल २०७१, जुडशीतल पर्व का हार्दिक मंगलमय शुभकामना सुख, सु-स्वास्थ्य, दिर्घायु, तथा तथा उत्तरोत्तर प्रगतिक कामना हैं... !!!!! जो यू और अपने सपनों को हर तक सफलता मिलती है सूरज के लिए सच हो जाता है बढ़ती...=== 

मधेश के सम्पूर्ण मधेशी जनता, ,स्वजाति,मित्र-गण, भाई, बहन, दोस्त, सभी को जुडशीतल सिरुवा पर्व के हार्दिक मंगलमय शुभकामना सुख, सु-स्वास्थ्य, दिर्घायु, तथा तथा उत्तरोत्तर प्रगतिक कामना हैं... !!!!! जो यू और अपने सपनों को हर तक सफलता मिलती है सूरज के लिए सच हो जाता है बढ़ती...जुड-शितल सिरुवा पर्ब के बरसए हर्ष नितसुख शान्तिक ई नदी बहाबए ।करए मनोरथ पूरा सभकेरजन–जनमे प्रित स्नेह जगाबए ।

।मधेश तराई क्षेत्रक महत्व पूर्ण पर्ब मधेशी वर्ग के जुड-शितल सिरुवा पर्ब के राष्ट्रिय पर्ब के रुपमे अधिराज्य भर बैशाख २ गते के दिन बिदा कायम करु. और मधेश तराई के समस्त मधेशी आ नेपाली वर्ग के जुड-शितल सिरुवा पर्ब के रास्ट्रिय मधेशी बिदा कायम करु और जुड-शितल सिरुवा पर्ब मे मधेशी बिदा कायम करु…जय मधेश जय "नव संवत् मुझे नव संचार भरे जग की नौसेना चांदनी; नव आशा के कलश सजाकर , मंगलमय करे संसार" आप सभी माहनुभाओ का आभिवादन नव वर्ष संवत २०७१ की हार्दिक बधाई नयाँ बर्ष २०७१ जुड शितल सिरुवा पर्ब के हार्दिक मंगलमय शुभकामना। बिक्रम्संबत के सुरवात राजा बिक्रम दितय के सम्यसे होते आरहा है। जुड-शितल त्योहार मिथिला ( हिन्दु ) का नया साल है जो कि १ वैशाख पर पड़ता है निशान. मिथिला क्षेत्र में भी भारत, वे अभी भी बिक्रम सम्बत कैलेंडर का पालन करने के लिए इस नए साल का जश्न मनाने. इस त्योहार के दौरान मैथिलि लोग जानकारीपूर्ण कार्यक्रमों के विभिन्न प्रकारों का आयोजन.करते है। 

 नव संवत् मुझे नव संचार भरे जग की नौसेना चांदनी; नव आशा के कलश सजाकर , मंगलमय करे संसार" आप सभी माहनुभाओ का आभिवादन नव वर्ष संवत २०७१ की हार्दिक बधाई नयाँ बर्ष २०७१ जुड शितल सिरुवा पर्ब के हार्दिक मंगलमय शुभकामना। बिक्रम्संबत के सुरवात राजा बिक्रम दितय के सम्यसे होते आरहा है। जुड-शितल त्योहार मिथिला ( हिन्दु ) का नया साल है जो कि १ वैशाख पर पड़ता है निशान. मिथिला क्षेत्र में भी भारत, वे अभी भी बिक्रम सम्बत कैलेंडर का पालन करने के लिए इस नए साल का जश्न मनाने. इस त्योहार के दौरान मैथिलि लोग जानकारीपूर्ण कार्यक्रमों के विभिन्न प्रकारों का आयोजन.करते है। 

 शब्द जुडशितल दो शब्दों से ली गई है: जो 'जमात' आशीर्वाद और इसका मतलब है 'शितल ' ठंडा मतलब है. मिथिला क्षेत्र बैशाख २ गते के महीने के बाद भीषण गर्मी का सामना इसलिए, इस त्योहार के लिए एक शांत वातावरण लाने के लिए मनाया जाता है. यह त्यौहार भी त्योहार सफाई और स्पष्टता के रूप में माना जाता है. लोगों के लिए अनिवार्य इस त्योहार के दौरान स्तु खाने के लिए है. इसी तरह, बडी झोड़ी और चिरैटो अन्य इस त्योहार में महत्वपूर्ण खाद्य वस्तुओं रहे हैं. हमारे वर्तमान संदर्भ में, हमारी संस्कृति और प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण के पहलू पर, इस त्योहार महत्वपूर्ण माना जा सकता है.

नव बर्षमे बरसए हर्ष नित सुख शान्तिक ई नदी बहाबए । करए मनोरथ पूरा सभकेर जन–जनमे प्रित स्नेह जगाबए ।।

जुडशीतलक शीतलता सहेजिकऽ हमरासभक पहिचान नष्ट करबाक लेल अपने डारिपर उगल किछु बाँझीसभक अमरलत्तीपनकेँ लतियबैत अपन हरियरी कायम राखि सकी, इएह अछि नव वर्ष २०७१ क हार्दिक मङ्गलमय शुभकामना

नव वर्षक नव भोरमे, नव उमंगमे नव तरंगमे, अहाँक हृदय नव उत्सवसँ भरए, मनमे शान्ति, सफलता जिवनमे, नव स्वप्नसँ नयन सदति भरल रह………। नव वर्षक हार्दिक मंगलमय शुभकामना ।===

 नव वर्ष २०७१ क हार्दिक शुभकामना ।

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स्वजाति के सभी सदस्यों के लिए प्रकृति के कोने जो हमें बताता है सम्थिंग  से खुश नया साल, बधाई. २०७१ १  बैशाख  पर अपनी गतिविधियों से पर्यावरण बारिश हो रही, इसके रेक्नेउ  हवाओं मयाँथिंग  नष्ट कर. नष्ट के लिए गड़गड़ाहट का प्रतीक है. इसलिए है कि हम बहुत ध्यान से हमारे राष्ट्र के लिए जाना है, क्योंकि इस साल हमें दिखाने के लिए सुनहरा वर्ष है होना चाहिए कि उच्चतम लेने सगरमाथा एवं गौतम बुद्ध  .....................


" नव संवत्सर अर्थात नव वर्ष का अभिनन्दन !"

"क्रोध्ब्दे निखिला लोकाः क्रोध लोभ परायणाः|

इतिदोषेण सततं मध्य सस्यार्घ वृष्टयः|| 

आर्यावर्त की संस्कृति एवं संस्कार के अनुयायी ,समस्त मित्रवर ,नूतन संवत्सर ,[नववर्ष] के आगमन पर हम अभिनन्दन करते हैं , साथ ही -उन्नति ,प्रसन्नता की कामना भी ! राम - राम,नमस्कार , ||

 आंग्लभाषा [अंग्रेजी ] -का साल तो प्रारंभ हो चूका है ,सभी जानते हैं किन्तु हम अपनी ही संस्कृति से अनभिग्य होते जा रहे हैं | चैत्र मास की प्रतिपदा से नवसंवत्सर का प्रारंभ होता है -अंग्रेजी का -2014 और संस्कृत का संवत्सर -२०७१ है |

अस्तु -इस संवत्सर का रजा चन्द्र एवं मंत्री गुरु हैं जो मित्रता के प्रतीक हैं ,जब आपस में प्रेम होता है तो प्रसन्नता भी आती है |

[१]-संवत्सर का नाम -क्रोधी है -तो ये बात भी पक्की है की सभी क्रोधी स्वाभाव के सालभर रहेंगें ,और क्रोध का कारण लोभ होता है -हो सके तो हमलोग लोभ कम करेंगें तो क्रोध स्वतः ही समाप्त या कम हो जायेगा -जिससे हमारा विकास होगा ||

[२]-अन्न की स्थिति -टिड्डी ,कीटदोष,विषाक्त वायुमंडल -के कारण -अन्न ,खनिज पदार्थ कम उत्पन्न होंगें -क्योंकि इसके कारण भी हमहीं हैं -तो हो सके तो प्रकति के साथ चलें ||


[३]-वर्षा -जल के विना सब कुछ अधुरा रहेगा -परन्तु -वरुण देवता की यत्र -तत्र मामूली कृपा बनी रहेगी -अतः जल का भी सम्मान करें ||

[४]-वस्तु-हमारी आवश्यकताएं इतनी बढ़ गयीं हैं कि पूर्ति ही नहीं हो पातीं हैं -"अन्नात भवति पर्जन्नाया " जब अन्न कम होंगें [वस्तुएं कम होंगीं तो मंहगाई भी बधेंगीं ||


"देव युवा एकता" जिन्दाबाद। देव युवा सब एक जुट होऊ।